रामी बौराणी से भी बड़ी विरह गाथा: जब 30 बरस बाद सुरों की उंगली थामकर आंगन लौटे महिपाल सिंह रजवार

रामी बौराणी से भी बड़ी विरह गाथा: जब 30 बरस बाद सुरों की उंगली थामकर आंगन लौटे महिपाल सिंह रजवार 

 

 – शीशपाल गुसाईं 

 

विश्व साहित्य में यूनान के महान नायक ओडिसियस की कहानी बहुत प्रसिद्ध है, जो युद्ध के बाद अपने घर लौटने के लिए 20 वर्षों तक समुद्रों और तूफानों से लड़ता रहा। जब वह घर लौटा, तो केवल उसका कुत्ता और उसकी पत्नी उसे पहचान पाए थे। लेकिन अल्मोड़ा के चक केलानी गांव के महिपाल सिंह रजवार की कहानी उस पौराणिक कथा से भी कहीं अधिक संघर्षपूर्ण और मार्मिक है। ओडिसियस का वनवास 20 साल का था, जबकि महिपाल का विछोह पूरे 30 साल का रहा।

 

गीत की शक्ति: जब संगीत बना ‘जीपीएस’

 

इतिहास गवाह है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब सैनिक सालों तक घर नहीं लौटे, तो रेडियो पर बजने वाले गीतों ने उन्हें जिंदा रहने की उम्मीद दी थी। महिपाल के मामले में कुमाउँनी लोक गायिका अनीता रजवार का गीत ‘ओ घुघुती – उड़ी उड़ी जा……’ वही संजीवनी बना। इस गीत में सिर्फ सुर और ताल नहीं थे, बल्कि इसमें महिपाल के अपने घर की चौखट और चक केलानी गांव की वह मिट्टी दिखाई गई थी, जिसे वे 1993 में छोड़ आए थे। पत्रकार मोहित बिष्ट की रिपोर्ट के अनुसार, ओ घुघुती गीत व सोशल मीडिया के मेल ने उस पहचान को पुख्ता किया, जिसे समय की धूल ने लगभग धुंधला कर दिया था।

 

प्रतीक्षा की पराकाष्ठा: वीणा देवी का धैर्य

 

महिपाल की घर वापसी की तुलना यदि भारत की पौराणिक कथाओं से करें, तो यह ‘रामी बौराणी’ के 12 वर्षों के इंतजार को भी पीछे छोड़ देती है। यह कहानी हमें आधुनिक युग की ‘शबरी’ की याद दिलाती है। 30 साल तक वीणा देवी ने उस देहरी को बुहारा, उस आंगन को संवारा और अपनी बेटी दिव्या को इस उम्मीद में पाला कि एक दिन उनके पति लौटेंगे।

 

वह हृदय विदारक मिलन: जब शब्द मौन हो गए

 

जब महिपाल सिंह रजवार 30 साल बाद अपने आंगन में कदम रखते हैं, तो वह दृश्य किसी फिल्म के क्लाइमेक्स से भी ज्यादा भारी था। महिपाल जड़वत खड़े थे, मानो 30 साल का बोझ उनके कंधों पर अचानक आ गिरा हो। लेकिन उनकी पत्नी वीणा देवी का बांध टूट गया। वे फफक-फफक कर पति से लिपट गईं। वह विलाप दुख का नहीं, बल्कि उन तीन दशकों की खामोशी के टूटने का था। उस रोने में 10,950 दिनों का अकेलापन, संघर्ष और समाज के ताने सब बह रहे थे। वृद्ध माँ की धुंधली आंखों ने जब अपने ‘महिपाल’ को स्पर्श किया, तो लगा मानो समय का पहिया उल्टा घूम गया हो।

 

एक संदेश: गीत और जड़ों की पुकार

 

यह घटना हमें याद दिलाती है कि इंसान दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए, उसकी जड़ों की पुकार उसे ढूंढ ही लेती है। जिस तरह एक प्रवासी पक्षी हजारों मील दूर जाकर भी अपने घोंसले को नहीं भूलता, उसी तरह महिपाल को भी उनकी अपनी संस्कृति के एक गीत ने वापस बुला लिया। 30 साल बाद जब वे 30 मार्च 2026 को लौटे, तो बेटी दिव्या, जो उस वक्त मात्र 3 महीने की थी, आज एक पूरी उम्र जी चुकी थी। यह केवल एक परिवार का मिलन नहीं है, बल्कि यह लोक संस्कृति, संगीत की ताकत और एक नारी के अटूट विश्वास की वैश्विक जीत है। आज चक केलानी का यह आंगन केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेम और धैर्य का एक पवित्र तीर्थ बन गया है। यह कहानी अब एक अंतरराष्ट्रीय अपील रखती है, क्योंकि यह मनुष्य की मूल भावना—’अपने घर लौटने की चाह’—पर आधारित है।

 

“ओ घुघुती उड़ी उड़ी जा’ गीत, जिसे लोकगायिका अनीता रजवार ने स्वर दिया है (इसका यूट्यूब लिंक कमेंट बॉक्स में उपलब्ध है), महिपाल के लिए अपने घर की पहचान बन गया।”

 वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुसाई की फेसबुक वाल से

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