देवभूमि का वह रहस्यमयी संत: जिसे साक्षात 'अन्नपूर्णा' का वरदान प्राप्त था
हिमालय की गोद में बसा उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, सदियों से ऋषियों, मुनियों और सिद्ध संतों की तपोस्थली रहा है। इसी दिव्य भूमि के अल्मोड़ा में कोसी और सिरोत नदियों के संगम पर एक ऐसा स्थान है, जहाँ समय की गति थम सी जाती है। यहाँ स्थित है एक प्राचीन शिवालय, और ठीक 300 मीटर की दूरी पर पहाड़ी की ढलान पर बसी है— श्री 108 सोमवारी बाबा की चेतन समाधि। कौन थे सोमवारी बाबा? उनका वास्तविक नाम परमानंद ब्रह्मचारी था। बाल्यावस्था में ही संसार की नश्वरता को समझकर वे घर-बार छोड़कर तीर्थाटन पर निकल पड़े थे। वे बाल ब्रह्मचारी थे और उनकी दिनचर्या प्राचीन ऋषियों के समान थी। शरीर पर केवल एक लंगोट, माथे पर जटाओं का मुकुट और हाथ में चिलम—यही उनकी पहचान थी। लोग उन्हें प्यार से 'सोमवारी महाराज' कहते थे, क्योंकि प्रत्येक सोमवार को उनके आश्रम में विशाल भंडारा होता था। चमत्कार: जब स्वयं 'अन्नपूर्णा' ने दी दस्तक बाबा का नियम अत्यंत कठोर था—उनके आश्रम में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित था। लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने सबको हैरान कर दिया। विश्वत संक्रांति के दिन, एक साधारण स्त्री छोटी सी टोकर...