आशाओं व आशा फैसिलेटरों ने धरना दें आक्रोश व्यक्त किया
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कार्यरत आशा तथा आशा फैसिलेटरों ने नारेबाजी के साथ अलग अलग जिलें के कलक्ट्रेट पर प्रदर्शन किया। उन्होंने कहा कि वह लंबित मांगों का समाधान नहीं होने से आक्रोशित हैं। मिशन के तहत वह शहर तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य योजनाओं को पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
देहरादून सहित कई जिलों में एक दिवसीय धरना करके जिला अधिकारी के माध्यम से माननीय प्रधानमंत्री व माननीय मुख्यमंत्री को विभिन्न मांगों के निराकरण हेतु ज्ञापन सौंपा।
आशा तथा फैसिलिटेटर तथा आशा संगिनी को सरकार तथा आम जनता स्वास्थ्य विभाग की रीड़ मानती है, लेकिन वह समस्याओं का समाधान के लिए परेशान हैं। ईमानदारी तथा निष्ठा से काम कर रही हैं। कोविडकाल में उनकी अहम भूमिका रही। वर्तमान में भी वह कई किमी तक पैदल चल कर योजनाओं को गांव पहुंचा रहीं हैं। उन्होंने सरकारी कर्मचारी घोषित करने, सामाजिक सुरक्षा, सेवा नियमावली, ईपीए की सुविधा आदि देने की मांग की। ऐसा नहीं होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।
उत्तराखंड के कुमाऊं गढ़वाल के अलग-अलग जिलों की आशा एवं फैसिलेटटरों का कहना है।हम लोग लंबे समय से राज्य सरकार व केन्द्र सरकार को अपनी विभिन्न मांगों के निराकरण के लिए कभी ज्ञापन के जरिए कभी धरना प्रदर्शन के जरिए अवगत करा चुके हैं लेकिन अभी तक हमारी जायज़ मांगों के निराकरण के लिए ना केन्द्र सरकार ने कोई ध्यान दिया ना राज्य सरकार ने। इन आशा कर्मचारियों का कहना है।हम लोगों को स्वस्थ्य बिभाग के अलावा और भी सरकारी विभागों का दिया जाता परन्तु मानदेय के नाम से एक आम मजदूर के बराबर मानदेय नहीं दिया जाता है।इस न्यूनतम वेतन से पर्वतीय क्षेत्रों दुग्रम स्थानों की आशा कर्मचारियों को अपने घर परिवार के दिनचर्या चलाने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
आशा फैसिलेटटरों को 24 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन दिया जाय व आशा कार्यकर्ताओं 18हजार रुपए प्रतिमाह वेतन दिया जाय।
आशा एवं आशा फैसिलेटटरों को राज्य कर्मचारी घोषित किया जाय।
आशा कर्मचारियों की योग्यता अनुसार इन्हें पदोन्नति की जाय।
साल में सर्दी व गर्मियों की अलग-अलग युनिफॉर्म दी जाय। रिटायर्डमेंट बैनिफिट के तौर कम से कम 5लाख रुपये दिये जाय। आशा फैसिलेटटरों को 25दिन की डियूटी के बजाय 30 दिन की स्थाई डियूटी दी जाय।
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