SSJU: मिलेट्स सेमिनार के दूसरे दिन तकनीकी सत्र हुए संचालित

वनस्पति विज्ञान विभाग में कंजर्वेशन ऑफ ट्रेडिशनल क्रॉप्स इन हिमालयन रीजन विद स्पेश रिफेरेंश टू सेरेल्स एंड मिलेट्स सेमिनार के दूसरे दिन दीप प्रज्ज्वलित कर तकनीकी सत्र संचालित हुए।


चौथे सत्र में अध्यक्ष प्रो जी सी एस नेगी (एमेरिटस साइंटिस्ट, मानसखंड विज्ञान केंद्र, UCOST, अल्मोड़ा) ने फार्मूलेशन ऑफ रिसर्च प्रोब्लेम्स ऑन प्लांट्स एंड एम्पोवेर्मेंट्स विषय पर प्रस्तुतिकरण देकर शोध के दौरान आने वाली समस्याओं और उनके निदान को सोधारण समझाया। पांचवे तकनीकी सत्र में अध्यक्ष डॉ देवेंद्र सिंह धामी रहे। उन्होंने शोध कार्य कर रहे शोधार्थियों को निर्देशित किया।
सेमिनार के संयोजक डॉ0 धनी आर्या ने सेमिनार के तकनीकी सत्र की जानकारी दी और उन्होंने बताया कि लगभग 70 शोधपत्रों को ऑनलाइन और ऑफलाइन रूप से प्रस्तुत किया गया। सेमिनार में स्नातकोत्तर कक्षाओं के 10 विद्यार्थियों ने पोस्टर प्रस्तुतिकरण दिया। इस ग्रुप पोस्टर प्रस्तुतिकरण और मूल्यांकन में 10 पोस्टर सेरेल्स एवं मिलेट्स, चावल, फिंगर मिलेटस, पोषण, ज्वार उत्पादन, चिकित्सकीय फसल आदि पर पोस्टर प्रस्तुत किए गए। जिसमें निर्णायक रूप में प्रो रुबीना अमान (संकायाध्यक्ष विज्ञान), डॉ विजय कुमार, डॉ ललित जोशी रहे। सेमिनार में उत्कृष्ट शोधार्थियों और प्राध्यापकों को बेहतर शोध प्रस्तुतिकरण के लिए सम्मानित किया गया।इन विभिन्न तकनीकी सत्रों में ऑनलाइन एवं ऑफलाइन रूप से डाॅ0 विजय आर्या, सीमा चतुर्वेदी, पूजा कुमारी, अमीषा बिष्ट, आँचल रानी, हिमांशु शेखर, डॉ तेजपाल सिंह, डॉ निशा, परवीन, पूजा भंडारी, सोनिया, भावना पाण्डे, पंकज कुमार टम्टा, राजेश कुमार, डाॅ0 अर्चना कांडपाल, हिमानी तिवारी, मुक्ता मर्तोलिया, पूजा नेगी, भावना डंगवाल, सीमा, शीतल माथुर, दीपिका बिष्ट, , सूमन उपाध्याय, अनीष कुमार, आंचल रानी, अनिता नयाल, हिमाशु शेखर, लक्ष्मी, नेहा पंतोला, नेहा जोशी, पूजा बिष्ट, हिमानी तिवारी,पूजा कुमारी ठाकुर, रितुल कुमार, चंद्रकला डंगवाल, उषा चंद्रा, महिमा गड़कोटी, डाॅ0 बलवंत कुमार, नेहा रावत, चित्रा नेगी, गीतांजलि मिश्रा, डाॅ0 मंजुलता उपाध्याय, डाॅ0 जोया साह, डाॅ0 निशा आदि शोधार्थियों ने उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में मोटे अनाज की खेती, सामुदायिक भागीदारी, अनाजों में लगने वाले कीट, पोषण महत्ता, मोटे अनाजों की महत्ता, पारंपरिक कृषि, अंग्रेजी साहित्य में पारंपरिक फसल, फसलों पर प्रभाव, उत्तराखंड के समशीतोष्ण क्षेत्रों में एल्युसीन कोराकाना पोषण संबंधी लाभ और खेती पैटर्न, पश्चिमी हिमालय में आक्रामक पोधों की प्रजातियां, एल्यूसिन कोराकाना का नृवंशविज्ञान संबंधी अन्वेषण, गेहूं के शारीरिक अनुकलून में एब्सिसिक एसिड की भूमिका, उत्तराखंड में बदलती जलवायु परिस्थितियों में अमरंथ के पोषण मूल्य का अध्ययन, फाॅक्सटेल बाजराः समृद्ध सांस्कृतिक और औषधीय महत्व वाला लचीला अनाज, हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक फसलों के संरक्षण, स्वदेशी भोजन संबंधी ज्ञान, बाजरा की खेती पद्धति, कृषि पद्धति, मोटे अनाज की बदलती पस्थिति, बाजरा और गेंहू का तुलनात्मक विश्लेषण, कृषि पारिस्थितिकी, चाल्सिडाॅयड परजीवी, मधुमक्खियों की विविधता और कृषि, हिमालय के तराई क्षेत्र में कार्बन अवशोषण बढाने में कृषि फसल की भूमिका, पारंपरिक अनाज और बाजरा की खेती, धार्मिक प्रयोजन के लिए बाजरा आदि का वितरण, बाजरा और अनाज में रोग उत्पन्न करने वाले एस्परगिलस नाइजर का पृथक्करण और पहचान, टिकाउ कृषि, जलवायु अनुकूलन में बाजारा की भूमिका आदि पर शोध आलेख पढ़े।

समापन सत्र

इसके उपरांत सेमिनार का समापन किया गया है। समापन अवसर पर मुख्य अतिथि एमेरिटस साइंटिस्ट,मानसखंड विज्ञान केंद्र,UCOST एवं पूर्व निदेशक, ICFRE, शिमला डॉ एस एस सामंत, प्रो रुबीना अमान (संकायाध्यक्ष, विज्ञान), डॉ देवेंद्र सिंह धामी, सेमिनार संयोजक डॉ धनी आर्या, सह संयोजक डॉ बलवंत कुमार मंचासीन रहे। संचालन दीक्षा खुल्बे ने किया।
सेमिनार के सह संयोजक डॉ बलवंत कुमार ने सेमिनार की उपलब्धियों को सबके समक्ष प्रस्तुत किया। पोस्टर प्रतियोगिता और बेस्ट पेपर प्रेजेंटेशन में अव्वल आये विद्यार्थियों के नामों की घोषणा की।
इस अवसर पर सांख्यिकी अधिकारी अशोक कुमार ने कहा कि हम अन्तर्विषयी शोध को बढ़ावा दें। ऐसे सेमिनार से विद्यार्थियों को सीख मिलती है।
डॉ देवेन्द्र सिंह धामी ने कहा कि सेमिनार से हम नवीन ज्ञान अर्जित करते हैं। इनमें भागीदारी करते रहें। डॉ ललित जोशी ने मीडिया में सेमिनार की सूचना की जानकारी दी। विज्ञान संकाय की संकायाध्यक्ष रुबीना अमान ने कहा कि सेमिनार से सीखना चाहिए। कोशिश करके आगे बढिये। अपने वातावरण से जुड़ें।
मुख्य अतिथि रूप में डॉ एस.एस. सामंत ने एक महत्वपूर्ण विषय पर सेमिनार के आयोजन के लिए वनस्पति विज्ञान विभाग को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पारंपरिक फसलों और अनाजों की प्रजाति को चिन्हित कर सूची बनाई जाए। उन्होंने शोधकर्ताओं को पारंपरिक फसलों के संरक्षण के लिए विभिन्न संस्थानों का विजिट करने को लेकर प्रेरित किया। साथ ही कहा कि पलायन के कारण खेती कम हो रही है। पारंपरिक फसलों का उत्पादन करना होगा और पारंपरिक अनाजों को लेकर स्वरोजगार करने की आवश्यकता है जिससे पलायन रुकेगा।
अंत में समापन सत्र पर सेमिनार के संयोजक डॉ धनी आर्या ने सभी अतिथियों का आभार जताया। उन्होंने सेमिनार की सफलता के लिए सभी के प्रयासों की सराहना की।
सेमिनार में आयोजक सचिव डॉ0 सुभाष चंद्रा, डॉ0 मजूलता उपाध्याय, डॉ0 रवींद्र कुमार, इं. रवींद्रनाथ पाठक, प्रमोद भट्ट, के के कपकोटी, वरुण कपकोटी, डॉ जोया साह, मुक्ता मर्तोलिया, दीक्षा खुल्बे, नंदन जरौत,सुनील, चंदन कनवाल, पप्पू बाल्मिकी, हिमानी तिवारी, डॉ अर्चना कांडपाल, डॉ भावना पांडे, आँचल रानी, पूजा ठाकुर, लक्ष्मी, नेहा पंतोला, वरुण कपकोटी, पूजा बिष्ट, नेहा जोशी, अनिता नयाल, अमीषा बिष्ट आदि ने सहयोग दिया।
इस सेमिनार में जे.एन.पंत, डॉ तेजपाल सिंह,डॉ मनोज बिष्ट, डॉ सुमित खुल्बे, डॉ सुशील भट्ट, जयवीर नेगी, के साथ वनस्पति विज्ञान के सहित विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शोधछात्र, विद्यार्थी, मानसखंड संस्थान और गोबिंद बल्लभ पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान,कटारमल के वैज्ञानिक शामिल हुए।

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