हिंदू छात्रों का पहलगाम आतंकी हमले के बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन, पाकिस्तानी कान्फ्रेंस का किया विरोध

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की भयावहता ने केवल भारत को नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल पैदा कर दी है। हमले में धार्मिक पहचान के आधार पर हिंदू तीर्थयात्रियों को निशाना बनाया गया। और अब इस हमले की छाया अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हार्वर्ड यूनिवर्सिटी तक पहुंच गई है, जहाँ हाल ही में आयोजित पाकिस्तानी कान्फ्रेस 2025 को लेकर भारतीय छात्रों ने तीखी आपत्ति जताई है।

इस सम्मेलन में पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजे़ब और अमेरिका में पाकिस्तानी राजदूत रिजवान सईद शेख जैसे शीर्ष अधिकारी शामिल हुए। यह आयोजन, जो हार्वर्ड के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट में हुआ, हमले के कुछ ही दिनों बाद आयोजित किया गया — यही बात कई भारतीय छात्रों को खटक गई।

भारतीय छात्रों की आपत्ति

हार्वर्ड में पढ़ने वाले दो भारतीय छात्रों, सुरभि तोमर और अभिषेक चौधरी, ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर इस आयोजन पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि आतंकियों ने हमला करने से पहले पीड़ितों की धार्मिक पहचान की पुष्टि की, जो इसे एक सुनियोजित धर्म-आधारित आतंकवादी हमला बनाता है।

उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को भी पत्र लिखकर पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के वीजा रद्द करने की अपील की। छात्रों ने यह भी लिखा कि पाकिस्तान के कई नेता न केवल ऐसे हमलों की ज़िम्मेदारी से बचते हैं, बल्कि कश्मीर के नाम पर हिंसा को वैचारिक समर्थन भी देते हैं।

छात्रों की तीन प्रमुख मांगें

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी पहलगाम हमले की निंदा करते हुए सार्वजनिक बयान जारी करे।

पाकिस्तानी अधिकारियों की भागीदारी की समीक्षा की जाए।

धर्म-आधारित हिंसा से प्रभावित छात्रों को मानसिक व संस्थागत समर्थन प्रदान किया जाए।

छात्रों का यह भी कहना था कि हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थान ने अतीत में नस्लवाद, इस्लामोफोबिया और यहूदी-विरोधी घटनाओं के खिलाफ मुखर होकर खड़ा रुख अपनाया है — ऐसे में हिंदू विरोध या हिंदूफोबिया पर चुप्पी समझ से परे है।

हार्वर्ड की भूमिका पर सवाल

विवाद के बीच यह जानकारी सामने आई कि सम्मेलन की योजना पाकिस्तानी छात्रों ने बनाई थी और हार्वर्ड ने केवल समन्वयात्मक भूमिका निभाई। लेकिन फिर भी, कई छात्रों और पर्यवेक्षकों का मानना है कि विश्वविद्यालय को अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए।

हालात तब और विवादास्पद हो गए जब यह सामने आया कि हार्वर्ड साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक हितेश हठी ने एक पैनल में भाग लिया जिसमें पाकिस्तानी मूल की इतिहासकार आयशा जलाल भी शामिल थीं। इस पैनल समेत कई कार्यक्रमों की जानकारी बाद में संस्थान की वेबसाइट से हटा दी गई, लेकिन इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ।

पाकिस्तान की अमेरिकी अकादमिक संस्थानों में उपस्थिति
विवाद के पीछे एक और परत यह है कि पाकिस्तान की अमेरिकी शिक्षण संस्थानों में उपस्थिति बीते कुछ वर्षों में कम हुई है। ओपन डोर्स नामक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में पाकिस्तानी छात्रों की संख्या मात्र 10,988 है — जो भारत (3.3 लाख से अधिक), चीन, बांग्लादेश और नेपाल से भी कम है। ऐसे में कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस सम्मेलन के ज़रिये पाकिस्तान अपनी शैक्षणिक छवि सुधारने की कोशिश कर रहा था।

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