Nandadevi 2025 माँ नन्दा–सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण सम्पन्न

अल्मोड़ा। आस्था और परंपरा के प्रतीक ऐतिहासिक माँ नन्दा देवी महोत्सव में माँ नन्दा–सुनंदा की मूर्तियों का निर्माण सम्पन्न हो गया। नंदा देवी मंदिर परिसर में परंपरागत विधि-विधान के साथ भक्तिभावपूर्ण वातावरण में यह पावन कार्य सम्पन्न हुआ।

परंपरा और आस्था का संगम सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी माता नन्दा और सुनंदा की प्रतिमाएँ कदली वृक्षों से तैयार की गईं। कदली वृक्ष से मूर्तियों का निर्माण न केवल धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, बल्कि लोकसंस्कृति और पौराणिक मान्यताओं को भी जीवंत करता है। मान्यता है कि माँ नन्दा और सुनंदा का अल्मोड़ा आगमन क्षेत्र की सुख-समृद्धि और शांति का द्योतक है।मूर्ति संयोजक रवि गोयल ने बताया कि –“माँ नन्दा–सुनंदा की प्रतिमाएँ बनाना हमारे लिए केवल एक परंपरा नहीं बल्कि माँ की सेवा का अवसर है। कदली वृक्ष से मूर्तियाँ तैयार करना पीढ़ियों से चला आ रहा कार्य है, और इस पवित्र जिम्मेदारी को निभाना सौभाग्य की बात है। हम सभी का प्रयास रहता है कि माँ के स्वरूप को पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ बनाया जाए।

”मूर्ति निर्माण में सक्रिय सहयोगमूर्ति निर्माण कार्य में मूर्ति संयोजक रवि गोयल का विशेष योगदान रहा। इस अवसर पर दानिश आलम, रक्षित साह, सोनू प्रजापति, आशीष बिष्ट, रवि कन्नौजिया, डॉ. चंद्र प्रकाश वर्मा, देवेंद्र जोशी और सुरेश जोशी, अर्जुन सिंह बिष्ट मुख्य संयोजक, आशीष बिष्ट भी मौजूद रहे और उन्होंने परंपरा के अनुरूप सहभागिता निभाई।भक्तिभाव से गूंजा मंदिर परिसरमूर्ति निर्माण स्थल पर दिनभर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहा।

भक्तों ने न केवल निर्माण कार्य देखा बल्कि पूजा-अर्चना कर माँ नन्दा–सुनंदा का आशीर्वाद भी प्राप्त किया। मंदिर परिसर माँ के जयकारों और पारंपरिक गीतों से गूंज उठा।सांस्कृतिक धरोहर का पर्वस्थानीय लोगों का कहना है कि नन्दा देवी मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने वाला पर्व है। मूर्तियों का निर्माण सम्पन्न होने के साथ ही अब मेले की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ और भी अधिक उत्साह के साथ प्रारंभ होंगी।क्यों कदली वृक्ष से बनती हैं प्रतिमाएँ?कदली वृक्ष से माँ नन्दा–सुनंदा की प्रतिमाएँ बनाने की परंपरा शताब्दियों पुरानी है।

माना जाता है कि यह वृक्ष माता के साथ प्रकृति की ऊर्जा और शक्ति का प्रतीक है प्रतिमाओं का स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि प्रकृति और संस्कृति दोनों मिलकर ही जीवन को पूर्णता प्रदान करते हैं।

D S Sijwali

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D S Sijwali

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