हरेला का सीधा सम्बन्ध पंचतत्वों से है- कुलपति जगत सिंह बिष्ट

एसएसजेयू में हरेला पीठ व हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग ने एक दिवसीय ‘हरेला एवं पर्यावरण संरक्षण’ संगोष्ठी का किया आयोजन

टिश्यू कल्चर एक हाईटेक हरेला हैं- डॉ. पी. एस. बिष्ट

अल्मोड़ा। सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय में हरेला एवं पर्यावरण संरक्षण विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी आयोजित हुई। इस अवसर पर  संरक्षक रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो जगत सिंह बिष्ट, कार्यक्रम अध्यक्ष रूप में प्रो इला साह,  बीज वक्ता प्रो देव सिंह पोखरिया, वक्ता रूप में डॉ पी एस बिष्ट, कार्यक्रम संयोजक रूप में हरेला पीठ की निदेशक डॉ प्रीति आर्या,संचालन डॉ गीता खोलिया एवं डॉ तेजपाल सिंह आदि ने दीप प्रज्ज्वलित किया।


डॉ बलवंत कुमार ने हरेला पीठ की उपलब्धि एवं संगोष्ठी की विस्तार से रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि पीठ ने अपने स्थापना से लेकर अब तक कई प्रतिमान गढ़े हैं। पीठ लोक संस्कृति एवं पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्य कर रही है।  आगे भी पीठ के माध्यम से कई कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे।
बीज वक्ता प्रो देव सिंह पोखरिया ने कहा कि हरेला पर्व पर्यावरण के संरक्षण के लिए कुमाऊं का एक महत्वपूर्ण पर्व  है।  प्राचीन वानस्पतिक ज्ञान का मानवहित के लिए  उपयोग किया जा सकता है।  इनके अध्ययन के लिए हरेला पीठ कार्य कर सकता है। हरेला आने वाली फसल को लेकर एवं कृषि को लेकर एक सटीक अनुमान कराता है।हरेला के पीछे पारंपरिक ज्ञान समाहित है। इसके साथ ही उन्होंने वेदों में पर्यावरण, लोक में पर्यावरण आदि को स्पष्ट किया।   हवन सामग्री, अर्क आदि से पर्यावरण शुद्धि का प्रयास किया जाना चाहिए।

संरक्षक के रूप में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो जगत  सिंह बिष्ट ने कहा कि आज के समय में हरेला पर्व की बहुत महत्ता है। हरेला का सीधा सम्बन्ध पंचतत्वों से है। इसमें से किसी भी तत्व की कमी हो जाये तो कई समस्याएं पैदा हो जाएगी। हरेला का सामाजिक,सांस्कृतिक,धार्मिक एवं पर्यावरणीय महत्व है। आज पर्यावरण का क्षरण हो रहा है, लगातार वन भूमि ख़त्म हो रही है। जिस कारण प्रकृति का क्रम बिगड़ गया है। हमारे लोक साहित्य में वृक्षों को न काटने का निवेदन किया है, इसलिए हरेला पीठ जागरूक कर। उन्होंने कहा कि हमें प्राचीन ग्रंथों के मूल भावना को संरक्षण करना होगा। हमारे लोक साहित्य में अनुभव का विज्ञान समाहित है। जिसे समझना होगा। उन्होंने पौधरोपण के कार्यक्रमों को गंभीरता के साथ संचालित करने की बात कही।


मुख्य वक्ता के रूप में  डी आर डी ओ के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. पी. एस. बिष्ट ने रोल ऑफ प्लांट टिश्यू कल्चर इन कंजर्वेशन ऑफ एनवायरनमेंट विषय पर विस्तार से प्रस्तुतिकरण दिया। उन्होंने अड्वेंशस शूट्स, कैलोस, क्लोन, इन विट्रो, प्लांटलेट्स, मेक्रोन्यूट्रिएंट्स, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स,प्लांट्स हार्मोन्स, पोलन कल्चर, प्रोटोप्लास्ट कल्चर, ऑर्गन कल्चर आदि की जानकारी दी। इसके साथ ही प्लांट ऊतक संस्कृति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। टिश्यू कल्चर एक हाईटेक हरेला हैं। ऊतक के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा की।

अध्यक्षता करते हुए अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो इला साह ने कहा कि हमारे लोकपर्वों को संरक्षण की आवश्यकता है। युवा वर्ग हमारे पर्वों, पर्यावरण के लिए एक संसाधन हो सकते हैं। उनको निर्देशित करने की आवश्यकता है। आज पर्यावरण और संस्कृति का क्षरण हो रहा है जो चिंतनीय है। युवा हरेला पर्व को बड़ी जिम्मेदारी  के साथ मनाएं। उन्होंने सभी को पर्यावरण के प्रति सचेत रहने की बात कही और  प्रकृति के संरक्षण के लिए आगे आने के लिए प्रेरित किया। प्रो साह ने आयोजक मंडल के प्रयासों को सराहा। और कहा कि युवा धरती को हरा भरा करने में अपना योगदान दें।

इस संगोष्ठी की संयोजक एवं पीठ की निदेशक डॉ प्रीति आर्या ने कहा कि हरेला पीठ भविष्य में भी पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐसे ही उपयोगी सेमिनार एवं संगोष्ठी का आयोजन करता रहेगा। उन्होंने कहा कि हरेला पर्व का सीधा संबंध प्रकृति से है। हमें प्रकृति के संरक्षण के लिए ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित कराने की आवश्यकता है। उन्होंने सभी अतिथियों का आभार जताया।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ गीता खोलिया एवं डॉ तेजपाल सिंह ने संयुक्त रूप से किया।

इसके उपरांत तकनीकी सत्र का संचालन हुआ। जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में डॉ संदीप कुमार ने इंसेक्ट्स डाइवर्सिटी फोए और फ्रेंड्स? विषय पर प्रस्तुतिकरण दिया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण के संरक्षण में कीटों का योगदान  बहुत है। आज कई कीट रोजगार दिलाने, आर्थिकी बढ़ाने, पोलीनेशन के लिए, भोजन के लिए अपना सहयोग दे रहे हैं। उन्होंने कीटों के संरक्षण की बात कही।
तकनीकी  सत्र की अध्यक्षता डॉ प्रीति आर्या एवं हरेला पीठ के सह संयोजक डॉ बलवंत कुमार बतौर अतिथि मौजूद रहे।
इस सत्र में लक्ष्मण बृजमुख, भाष्कर धामी,  प्रेमा भट्ट आदि शोधार्थियों ने अपने शोध आलेखों का वाचन किया। इस सत्र का संचालन डॉ आशा शैली ने किया।

संगोष्ठी में कुलानुशासक डॉ मुकेश सामंत, जियो इंफॉर्मेटिक्स साइंस के समन्वयक डॉ नंदन सिंह बिष्ट, डॉ धनी आर्य, डॉ गीता खोलिया,डॉ ममता पंत,डॉ तेजपाल सिंह, डॉ माया गोला, डॉ बचन लाल, डॉ श्वेता चनियाल, डॉ दीपक टम्टा, डॉ लता आर्या, डॉ ललित जोशी,डॉ प्रतिमा, डॉ आशा शैली , डॉ.मनमोहन सिंह कनवाल, ग्रीन ऑडिट के निदेशक डॉ बलवंत कुमार, प्रो शेखर चन्द्र जोशी, प्रो भीमा मनराल (संकायाध्यक्ष,शिक्षा), डॉ सुभाष चंद्रा,  इं.रवींद्र नाथ पाठक, डॉ पूरन जोशी, डॉ अरविंद यादव, डॉ रवींद्र कुमार, लक्ष्मण बृजमुख, श्यामधन नौटियाल, विनीत कांडपाल, सुनील चौहान,, भाष्कर धामी, सुमन, अनिता दानु, सपना, प्रेमा गड़कोटी, हिमानी, मुक्ता मर्तोलिया, श्री रवि कुमार, डॉ लक्ष्मी वर्मा, डॉ शालिनी पाठक सहित कला एवं विज्ञान संकाय के विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

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