रौ कि लछिमा मडुवा नै खानि! पर आप खाइये और बढ़ाइये हेल्दी भोजन थाल की शान

उत्तराखंड का भरपूर खनिज पोषक तत्वों से निर्मित व स्वास्थ्यवर्धक मडुवा की मांग देश विदेशों में बढ़ती जा रही है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ज्येष्ठ,बैशाख में मंडुवे की बुआई की जाती है दो बार निराई गुड़ाई करके भादो के अंत व औसज के पहले चरण में मंडुवे की खेती तैयार हो जाती है।

आज से लगभग चालीस साल पहले उत्तराखंड राज्य में मडुवा उत्तराखंडियो का मुख्य आहार था। हर घर परिवार में मडुवे की रोटी का सेवन होता था। गेहूं महंगा होने से लोग ज्यादातर मडुवे की रोटी बनाया करते थे। गेहूं के आटे में मडुवा के आटे को मिलाकर गियू मडुवा रुवाट खाने भी परंपरा थी।

प्राचीन समय में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों गरीबी के कारण लोगों को गेहूं की रोटी कम प्रयाप्त होती थी लोग मडुवा की रोटी ही खाते थे कभी कभी गेहूं की रोटी खाया करते थे। इस मडुवे की रोटी के बारे में एक चांचरी भी बनाया गया था

रौ कि लछिमा मडुवा नै खानि कौछि गियू हैंगि अकरा।

पहले ,समय में उत्तराखंड में मडुवे का महत्व कोई भी नहीं जानते थे। खाली रोटी खाने तक आम आहार के तौर पर सेवन करते थे। लेकिन आज भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मडुवा जैसे भरपूर खनिज पोषक तत्व व स्वास्थ्यवर्धक अनाज की मांग बढ़ती जा रही है।

 

मडुवा स्वादिष्ट व पौष्टिक के साथ-साथ खनिज पोषक तत्वों स्वास्थ्यवर्धक अनाजों में सबसे सर्वप्रिय अनाज है।

प्रताप सिंह नेगी समाजसेवी ने बताया मडुवा स्वादिष्ट पौष्टिक के साथ-साथ अनेक प्रकार के रोगो की रोकथाम अन्य बिटामिनों से निर्मित है। महिलाओं का प्रसव के बाद उत्तराखंड में महिलाओं को मडुवे की बाई खिलाई जाती है देशी, में मडुवे के आटे को लोहे की कढ़ाई में भूनकर गुड सरबत डालकर मडुवे की बाड़ी बनाई जाती है। महिलाओं के प्रसव के बाद ये बाड़ी खिलाई जाती है। जिससे महिलाओं को ऊर्जा (energy)पोषक तत्वों की पूर्ती होती है।

दूसरी बात महिलाओं के प्रसव होते समय पेट में जो खून जमा रहता ये मडुवे की बाड़ी से धीरे धीरे सब साफ होकर निकलते रहता है। मडुवे में कैल्शियम, फास्फोरस बीटामीन बी, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, आयोडीन,, जिंक फाइबर बडाता है। ब्लडप्रेशर, डाइबिटीज , सुगर के रोगियों के लिए मडुवे की रोटी सेवन करना काफी लाभदायक होता है।

नेगी ने बताया उत्तराखंड के पलायन के कारण व उत्तराखंड में जंगली सुअरों व बंदरों के आतंक के कारण मडुवा की बुआई धीरे-धीरे पर्वतीय क्षेत्रों में कम होती जा रही है। बंदर व जंगली सुअरों के द्वारा मडुवा की खेती को नुकसान होता है इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीणों ने इस खेती को‌ कम कर दिया।

समाजिक कार्यकर्ता प्रताप सिंह नेगी

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