उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में अपने गाय भैंसों के लिए जंगलों में घास पात के लिए महिलाएं जाती है तो आये दिन बाघ व तेंदुआ के द्वारा आये दिन बारदात होती जा रही है।बाघ व तेंदुआ का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। बहुत से पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीण महिलाओं ने बाघ व तेंदुआ का आतंक के जंगल जाना छोड़ दिया।
लोगों ने गाय भैंस पालना कम कर दिया। इधर अगर कोई किसान लोग खेती पाती से साग, सब्जी,फल ,व अनाज का उधियम करते तो बंदर व जंगली सुअरों ने किसानों को खेती करना छुड़ा दिया।दिन में बंदर खेत खेत चौपट कर दे रहे हैं।जो बचा कुचा होता है, रात्रि को जंगली सुअरों के द्बारा करें तो क्या करें पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीण।
प्रताप सिंह नेगी समाजिक कार्यकर्ता ने बताया अगर उत्तराखंड सरकार की तरफ से तेंदुए व जंगली सुअरों के लिए कोई रोकथाम के लिए समाधान नहीं निकला तो आने भविष्य में उत्तराखंड का पलायन की रफ्तार और भी बढ़ सकती है। शासन प्रशासन ने उत्तराखंड पर्वतीय क्षेत्रों के ग्रामीण लोगों के बाघ व तेंदुआ, जगंली सुअर की रोकथाम के लिए कुछ ना कुछ समाधान निकाला चाहिए।
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