प्रस्तुति- प्रताप सिंह नेगी (समाजसेवी)
भगवान विश्वकर्मा को दुनिया के पहले इंजीनियर और देवताओं के वास्तुकार के रूप में जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने देवताओं के भवनों और हथियारों का निर्माण किया।
विश्वकर्मा पूजा हर साल 17, सितंबर को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।इस दिन के लिए एक दिन पहले ही मशीनरी व औजार ,रोज दिनचर्या के लिए लोहे के औजार धो धाक रख लिये जाते हैं।
अपने अपने घरों से लेकर फैक्ट्री, कनशक्शन्स कंपनियों में,व कल-कारखानों में मशीनरी,औजार, इंस्ट्रूमेंट, आदि सामान काम वाले की इस बिस्वकर्मा कर्मा पूजा में इन औजार व मशीनरी की पूजा होती है।आज के दिन बिस्वकर्मा कर्मा भगवान की मूर्ति बैठा कर पंडाल बनाया जाता है इस पंडाल में भगवान बिस्वकर्मा पूजा की बिधि बिधान से अपने अपने स्तर से अपने अपने कंपनियों में व कल-कारखानों में मशीनरी, औजार इंस्ट्रूमेंट आदि की पूजा की जाती है। अगले दिन 18सितबर को यह मूर्ति आस पास के नदी या गंगा नदियों में विसर्जन किया जाता है।
आइये इस पूजा की पौराणिक कहावत के बारे क्या कहा जाता है।जब सिष्टि का निर्माण हो रहा था वहां सर्वप्रथम भगवान नारायण यानी साक्षात भगवान विष्णु सागर में शेष सय्या पर प्रकट हुए। विष्णु के प्रकट होने के बाद उनकी नाभि कमल से चतुर्मुख भगवान ब्रह्मा द्रष्टिगोचर हो गए थे।
ब्रह्म के पुत्र धर्म और धर्म के पुत्र वासुदेव थे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बस्तु से वास्तु सातवें पुत्र थे।जो शिल्प शास्त्र में बहुत ही बुद्धिमान थे। बासुदेव की पत्नी अंगिरसी ने भगवान विश्वकर्मा को जन्म दिया। आगे चलकर अपने पिता की तरह अपने पिता की तरह भगवान विश्वकर्मा भी वास्तुकला के आदितीय आचार्य बने। जो तेरता युग में रावण की सोने की लंका बनाई थी उस लंका को बनाने में बिस्वकर्मा कर्मा भगवान का योगदान रहा।
पौराणिक कथाओं के अनुसार बताया जाता है शिव पुराण के अनुसार लंका को रावण नहीं बल्कि भगवान शिब ने बसाया था भगवान शिब ने पार्वती के लिए पूरी लंका को स्वर्णजड़ित बनवाया था लंका का निर्माण भगवान शिब के कहने पर देवी देवताओं के अनुसार शिल्पकार बिस्वकर्मा व कुबेर ने मिलकर समुद्र के मध्य त्तिकुटाच पर्वत पर किया था।
इसलिए पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल से भागवत बिस्वकर्मा कर्मा को प्रथम इंजिनियर माना जाता है।आज के आधुनिक युग में हर साल 17सितबर में अपने औजारों की व मशीनरी व अन्य इंस्ट्रूमेंट की पूजा अर्चना करके अपने काम व अपने व्यवसाय के लिए मन्नत मांगी जाती है।
भारत के कुछ हिस्सों में दिवाली के अगले दिन को विश्वकर्मा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन भक्त अपने औजारों की पूजा करते हैं और उन्हें आराम देते हैं।
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