World Post Day: डटकर खड़े हैं डाकघर
विश्व डाक दिवस (9 अक्टूबर) पर विशेष
मोबाइल और इंटरनेट के जमाने में पोस्ट ऑफिस (डाकघर) कितना पुराना-सा लगता है लेकिन इसकी अहमियत कम नहीं हुई है। भारतीय डाक की पहुंच आज भी ऐसी-ऐसी जगहों तक है जहां अभी तक प्राइवेट कुरियर कंपनियां भी नहीं पहुंच पाई हैं। 21वीं सदी में पोस्ट ऑफिस किन-किन बातों से हम सबके जीवन में प्रासंगिक बना हुआ है, आनेवाले विश्व डाक दिवस के मौके पर इसी बारे में बता रहे हैं डाक इतिहासकार अरविंद कुमार सिंह
एयरपोर्ट पर आज भी हज़ारों चिट्ठियां छांट रहीं मशीनें
बहुत-से लोगों को लगता है कि अब डाकघर काम के नहीं रहे, पर आज भी डाक की क्या अहमियत है, इसे जानना हो तो नई दिल्ली एयरपोर्ट के AMPC (ऑटोमैटिक मेल प्रोसेसिंग सेंटर) पर जाइए। आपको चारों तरफ चिट्ठियां और डाक से जुड़ी चीजें नजर आएंगी। एक अनुभवी डाक कर्मचारी घंटेभर में आमतौर 1000 चिट्ठियां छांट सकता है। लेकिन यहां की जर्मन मशीन 33,000 चिट्ठियां छांटकर डिब्बों में रख देती है। दूसरी मशीन मिक्स्ड मेल शॉर्टर एक घंटे में 18,000 डाक की चीजें छांटती है। यहां तीन शिफ्टों में 400 कर्मचारी रात-दिन 3.5 से 4 लाख डाक सामग्री छांटकर हवाई जहाजों पर चढ़ाते हैं। इसी तरह कोलकाता AMPC में रोज करीब 2.75 लाख डाकों का निपटारा होता है।
इंडियन पोस्टल ने देरी से ही सही, लेकिन खुद को संचार और सूचना क्रांति की ताकत से लैस किया है। कुरियर की चुनौतियों के बावजूद अपनी स्पीड पोस्ट सेवा की बाजार हिस्सेदारी 40% तक बनाकर रखी है। पासपोर्ट, रेलवे टिकट, आधार अपग्रेडेशन, कॉमन सर्विस सेंटर, पेमंट सर्विस भी डाकघर मुहैया करा रहे हैं। पैनकार्ड से लेकर तमाम सर्टिफिकेट घर पहुंचा रहे हैं। डिजिटल सर्विस पोर्टल, वोटर रजिस्ट्रेशन से लेकर डिटेल्स में बदलाव, श्रम सेवा, पेंशन, रोजगार सेवा के साथ कई राज्य सरकारें बहुत-सी उपयोगी सेवाएं दे रही हैं। इस तरह देखें तो हमारे डाकघर डाक टिकट, स्पीड पोस्ट, एक्सप्रेस पार्सल पोस्ट समेत तमाम सेवाओं के माध्यम से खुद को मार्केट में बनाए हुए हैं। हालांकि इन सभी सेवाओं के बारे में कम ही लोग जानते हैं।
इस वक्त डाकघरों में करीब 26 करोड़ पोस्ट सेविंग्स बैंक अकाउंट हैं। इनमें करीब 12.68 लाख करोड़ रुपये जमा हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारे के बाद डाकघरों में सुकन्या खाते खूब खुले हैं। करीब 3.12 करोड़ सुकन्या खाते डाकघर में हैं। डाकघर निवेश का सुरक्षित जरिया हैं। देश में 5 लाख से ज्यादा छोटे बचत एजेंटों को भी इससे काम मिलता है। PPF, किसान विकास पत्र (KVP), सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) आदि योजनाओं के साथ महिला बचत को काफी लोकप्रियता मिली। डाकघरों की विश्वसनीयता को ध्यान में रखकर सरकार में 1 सितंबर 2018 को इंडिया पोस्ट पेमंट बैंक (IPPB) शुरू किया। अब 1000 ATM के अलावा बैंकिंग सर्विस दी जा रही हैं। डाकघरों में 13,354 आधार और 426 डाकघर पासपोर्ट सेवा सेंटर भी हैं।
संचार और IT क्रांति के इस युग में भी भारत में 1,64,972 डाकघर हैं। इनमें करीब 1.5 लाख डाकघर गांवों में हैं। 2004 में 1,55,669 डाकघर थे। पिछले 5 बरसों में 5,639 नए डाकघर खुले हैं। संसद में अब डाकघरों पर भले कम सवाल पूछे जा रहे हों पर सांसद नए डाकघरों को खोलने की मांग अब भी करते रहते हैं। हमारे डाकघरों समेत दुनिया में करीब 6.40 लाख डाकघर हैं। सबसे ज्यादा डाकघर भारत में हैं। 20वीं सदी के पहले डाक ही संचार का सबसे प्रमुख साधन था। फोन आम आदमी के हैसियत के बाहर थे। मोबाइल और इंटरनेट क्रांति ने सबसे ज्यादा डाकघरों को प्रभावित किया। डाकघर बंद हुए, पर इस दौर में भारत ही ऐसा देश है जहां डाकघर बढ़े हैं।
संसद भवन में 2 डाकघर हैं। वहां काम करने वालों को लोग भले ही न जानते हों पर 21 बरसों तक वहां के पोस्टमैन रहे रामशरण को लोग जरूर जानते हैं। हाल में उनकी जगह तैनात पोस्टमैन प्रदीप भी तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। 21 साल पहले वह संसद भवन में रोजाना 3 बोरे (50 किलो का एक बोरा) डाक बांटते थे। हाल के बरसों में वह घटकर एक बोरा रह गई हैं। इनमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष से लेकर नेता विपक्ष, संसदीय समितियों के साथ संसद के कर्मचारियों की काफी डाक होती हैं। पर रामशरण 41 बरसों तक पोस्टमैन के पोस्टमैन ही बने रहे। उनका ओहदा नहीं बढ़ा। हमारे पोस्टमैन मनुष्य ही नहीं, भगवान की डाक भी कई मंदिरों में जाकर बांटते हैं। नदी के नाम आई डाक भी बांटते हैं। वे अपने इलाके के भूगोल के साथ समाज की भी गहरी समझ रखते हैं।
राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास या मंत्रालयों में कुरियर वालों को एंट्री नहीं मिल पाती है लेकिन यहां पर पोस्टमैन की पहुंच में कोई रुकावट नहीं आती। शिमला में एक पोस्टमैन जोगिंदर शर्मा ने मुझे एक ऐसी जगह से शिमला का नजारा दिखाया, जहां जाना आमतौर पर मुमकिन नहीं है। भारतीय डाक की धुरी में करीब 2.5 लाख ग्रामीण डाक सेवक हैं। चिट्ठियों के साथ वे 5 से 35 किग्रा. वजन तक के पार्सल भी ढो रहे हैं। पोस्टमैन का जीवन प्रेरक न होता तो तमाम भाषाओं में सबसे ज्यादा रचनाएं न लिखी गई होतीं। वे बच्चों के सबसे लोकप्रिय खिलौनों में रहे, कथाओं, लोकगीतों और फिल्मों में शामिल रहे। मशहूर कवि सोहनलाल द्विवेदी ने तो यहां तक लिखा कि उनके थैले में जग का सारा रहस्य बंद रहता है। पढ़ें:
यह भाग्य और दुर्भाग्य
सभी का फल लेकर तुम जाते
कोई रोता कोई हंसता,
तुम पत्र बांटते ही जाते।
इस जग का सारा रहस्य,
तुम थैले में प्रतिदिन किए बंद
आते रहते हो तुम पथ में,
विधि के रचते से नए छंद।
ग्रामीण इलाके ही भारतीय डाक की असली ताकत हैं। आजादी के बाद उदार सरकारी नीतियों के कारण गांवों की जरूरतों के हिसाब से अनूठे डाकघर खुले। कहीं नावों पर फेरी बोट पोस्ट ऑफिस, मोबाइल पोस्ट ऑफिस, पहाड़ी गांवों में टट्टू और खच्चरों पर डाकघर तो रेगिस्तानी इलाके में ऊंट डाकघर खुले। 1953 में कश्मीर में सैलानियों की सुविधा के लिए डल झील पर तैरता डाकघर खुला। ऐसे कई प्रयोग हुए जो सफल रहे।
भारतीय डाक का गौरवशाली अतीत रहा है। 1727 में कोलकाता में पहला आधुनिक डाकघर खुला। 1774 से 1793 के बीच कोलकाता, चैन्ने और मुंबई में GPO खोले गए। डाक सेवाओं में एकरूपता के लिए भारतीय डाकघर अधिनियम 1837 और व्यापक भारतीय डाकघर अधिनियम 1854 में अस्तित्व में आया। डाक विभाग देश के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण विभागों में है। भारतीय डाक 166 सालों से ज्यादा समय से देश की संचार तंत्र की रीढ़ बना रहा है।
भारतीय डाक की एक से एक शानदार इमारतें अपने शहरों की पहचान हैं। मुंबई GPO, दिल्ली का गोल डाकघर और कश्मीरी गेट GPO, कोलकाता GPO, मद्रास और लखनऊ GPO समेत कई शानदार इमारतें भारतीय डाक इतिहास में खास जगह रखती हैं। 36 तो हेरिटेज डाकघर हैं। नई दिल्ली 110001 पिन कोड नंबर वाले गोल डाकघर को राजधानी के लोग अच्छी तरह से जानते हैं। यह डाकघर हेरिटेज बिल्डिंग है। 1934 तक यह वायसराय का कैंप पोस्ट ऑफिस था। आजादी के बाद 1948 में इसे प्रधान डाकघर या GPO का दर्जा मिला। काफी व्यस्त इस डाकघर में डाक कर्मचारी आधार अपग्रेडेशन से लेकर फाइनैंशल सर्विसेज और परंपरागत सेवाओं में बेहद व्यस्त दिखेंगे।
भारतीय डाक के सामने बहुत-सी चुनौतियां हैं। उसके बजट का 91 फीसदी हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च होता है। वहीं डाक विभाग का रेवेन्यू आज के दौर में चुनौती भरा काम है। 2015-16 में इसका रेवेन्यू 12939.79 करोड़ रुपये और खर्च 18946.97 करोड़ रुपये था। 2020-21 में कोरोना संकट के कारण रेवेन्यू घटकर 10632.31 करोड़ हुआ जबकि खर्च बढ़कर 28,327 हो गया। 2018-19 के बाद रेवेन्यू के मामले में इसके सामने काफी गंभीर चुनौती दिख रही है। डाक भवनों के लिए कई जगह प्लॉट खाली हैं। वहीं सालाना 106 करोड़ रुपये से ज्यादा किराया डाक विभाग दे रहा है। भविष्य में भारतीय डाक अपनी सर्विस बढ़ाने के साथ जो उम्मीदें बांधे हुए है, उसके लिए अभी बहुत रकम के निवेश के साथ श्रम शक्ति बढ़ाने की दरकार है।
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