X

अर्थपूर्ण बनी शैक्षणिक यात्रा

एसएसजे के भूगोल विभाग के विद्यार्थियों ने किया रानीखेत से लेकर द्वाराहाट के प्राकृतिक, सांस्कृतिक व धार्मिक जगहों का अवलोकन

बीते मंगलवार 9 मई को को सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा के भूगोल विभाग का शैक्षणिक भ्रमण कोसी बैराज होते हुए शीतला खेत में स्याही देवी मन्दिर गया। कोसी नदी पर बना बाँध अल्मोड़ा को जलापूर्ति करता है। यहाँ पर कोसी नदी एक विसर्प(River Meander) का निर्माण करती है। कहीं – कहीं कोसी के द्वारा बाढ़ के मैदानों का निर्माण भी किया गया है। नदी के द्वारा बनाई गई ये स्थलाकृतियाँ मनुष्य के लिये अति महत्वपूर्ण हैं। सभ्यता के निर्माण में इन स्थलाकृतियों का अहम योगदान है।

प्राकृतिक सौंदर्य ने सभी का मन मोह लिया


स्याही देवी स्वामी विवेकानंद जी की तप स्थली है। स्वामी जी ने अपने अल्मोड़ा प्रवास के दौरान यहाँ दो दिन ध्यान किया था । अल्मोड़ा जिन तीन चोटियों, कसार देवी, बानड़ी देवी, स्याही देवी, से घिरा है, उनमें स्याही देवी प्रमुख है। यहाँ की शीतल जलवायु, फलों के बगीचे, बाँज, बुरांश और देवदार के वन सहज ही मन को मोह लेते हैं। पर्यावरण पर मानव के प्रभावों से यह क्षेत्र भी अछूता नहीं है। जी सी बी मशीन के द्वारा सड़क काटी गई है जो घने वनों के मध्य से होकर गुज़रती है। जाने कितने बाँज के पेड़ों की बलि चढ़ाई गई होगी।


इसके बाद सभी शिक्षक और छात्र – छात्राएं रानीखेत स्थित चौबटिया गार्डन गये। गार्डन में कई तरह के फूलों ने बरबस ही सबका मन मोह लिया। सरकार का विजन हो तो राज्य में फ्लोरीकल्चर विकसित हो सकता है। सेब, आड़ू के पेड़ों में फल आये हुए थे जो कि पके नहीं थे। चौबटिया उद्यान के पश्चात सौनी स्थित बिंसर महादेव गये। शिव को समर्पित यह मन्दिर देवदार और चीड़ के घने वनों के मध्य स्थित है जहाँ एक छोटी सी नदी बहती है। रानीखेत नगर से इसकी दूरी 15 किलोमीटर है।

एम ए प्रथम तथा तृतीय सेमेस्टर के विद्यार्थियों ने किया प्रतिभाग

भ्रमण की इस पूरी प्रक्रिया में भूगोल विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ ज्योति जोशी, डॉ दीपक, डॉ अरविंद यादव, डॉ पूरन जोशी तथा श्री ललित पोखरिया शामिल थे। भ्रमण में एम ए प्रथम तथा तृतीय सेमेस्टर के छात्र- छात्राएं थीं।

भ्रमण के दूसरे दिन के कर्यक्रम

शैक्षणिक भ्रमण के अगले दिन छात्र-छात्राओं ने रानीखेत में स्थित हैडाखान मंदिर का भ्रमण किया। यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता और शान्तमय वातावरण में सभी को काफी अच्छा लगा। सामने फैली महान हिमालय की बर्फीली चोटियों को एक चाप के आकार में यहाँ से देखा जा सकता है। इनकी पहचान के लिए यहाँ ठीक इनकी सीध में इनका चित्र लगाया गया है जो कि ज्ञानवर्द्धक है।


रानीखेत में स्थित रानी झील एक कृत्रिम झील है जो पर्यटकों के अकर्षण का केंद्र है यद्यपि झील में नौका विहार आजकल बंद है लेकिन आस-पास फैले चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों का घना जंगल, आर्मी कैंट का साफ़ -सुथरे वातावरण में घूमने का आनंद ही और है।
अब बारी थी द्वाराहाट की ओर प्रस्थान करने की।रानीखेत जो कि 1860 मीटर की ऊँचाई पर है, द्वारहाट के मार्ग में गगास नदी जो औसत 1300 मीटर की ऊँचाई में प्रवाहित होती है, में जलवायुगत अंतरों से उत्पन्न विभिन्नताओं को स्पष्ट समझा जा सकता है। यहाँ के तापमान रानीखेत से ज्यादा हैं। वनस्पति का अन्तर एक महत्वपूर्ण संकेतक है जलवायु परिवर्तन का।


द्वाराहाट नगर जो कि एक ऐतिहासिक नगर रहा है जहाँ कत्युर काल के बने भव्य मंदिर हैं। इन मंदिरों में महा मृत्यंजय मंदिर, गुर्जरदेव मंदिर आदि प्रसिद्द हैं। द्वाराहाट के ठीक ऊपर द्रोणगिरी चोटी हैं जहाँ दूनागिरी मन्दिर है। पुनः बांज, उतीस और बुरांश के जंगलों से होकर वहां पहुँचते हैं। अल्मोड़ा जिले की सबसे ऊंची छोटी भटकोट इसी क्षेत्र में स्थित है। इसके नीचे गगास नदी बहती है जो कि बिन्ता-बग्वालीपोखर को एक समृद्ध कृषि-घाटी में परिणित कर देती है। भूआकृति विज्ञान विषय विशेषज्ञ डॉ ज्योति जोशी जी ने यही बातें छात्र-छात्राओं को समझाते हुए कहा कि भूगोल के विद्यार्थी का इन घटकों को, चाहे वे भौतिक हों या सांस्कृतिक, समझने का अपना एक भिन्न पर्सपेक्टिव होता है जो कि हमारे द्वारा किये जाने वाले छोटे-छोटे अवलोकनों से विकसित होता है।

यही अवलोकन विश्लेष्ण में सहायक होते हैं। डॉ दीपक, डॉ अरविन्द यादव और डॉ पूरन जोशी ने भी विद्यार्थियों का समय-समय पर मार्गदर्शन करते हुए भ्रमण को अर्थपूर्ण बनाया।

This post was published on 11/05/2023 12:31 PM

swati tewari: working in digital media since 5 year
Related Post