उत्तराखंड में जंगल की जमीन पर बड़े पैमाने पर हुए अवैध कब्जों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में उत्तराखंड सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, जिसमें साइट प्लान के साथ-साथ अवैध निर्माणों की पूरी और अनुमानित जानकारी शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि अधिकारियों की लगातार लापरवाही इस पूरे मामले को और गंभीर बनाती है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने 22 दिसंबर को उत्तराखंड में जंगल की जमीन पर व्यवस्थित तरीके से हो रहे अवैध कब्जों के आरोपों पर गहरी चिंता जताई थी। अदालत ने जंगल की जमीन की रक्षा करने में राज्य मशीनरी की “चौंकाने वाली विफलता” पर स्वतः संज्ञान लेते हुए अपनी कार्यवाही का दायरा बढ़ाने का फैसला किया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यह मामला केवल अवैध कब्जाधारियों तक सीमित नहीं लगता, बल्कि इसमें अधिकारियों की मिलीभगत और सांठगांठ की आशंका भी दिखाई देती है। बेंच ने सवाल किया कि आखिर कितनी जंगल की जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है और क्या इसके पीछे अधिकारियों का मौन समर्थन रहा है। अदालत ने सरकार को दो सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें अवैध निर्माणों की प्रकृति और विस्तार से जानकारी देनी होगी।
क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट उत्तराखंड सरकार और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनीता कंडवाल की याचिका पर सुनवाई कर रही है। अदालत के समक्ष यह तथ्य आया है कि करीब 2,866 एकड़ जंगल की जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है। इस जमीन का एक हिस्सा ऋषिकेश स्थित एक सोसायटी और पशुलोक सेवा समिति को पट्टे पर दिया गया था। बाद में सोसायटी के लिक्विडेशन में जाने के बाद 23 अक्टूबर 1984 को सरेंडर डीड के जरिए 594 एकड़ जमीन वन विभाग को वापस सौंपी गई थी। इसके बावजूद वर्ष 2001 के बाद इस जमीन के कुछ हिस्सों पर अवैध कब्जे कर लिए गए।
जांच समिति बनाने का आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को सभी तथ्यों की जांच के लिए एक जांच समिति गठित करने का निर्देश दिया है। समिति को पूरे मामले की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।
नए निर्माण पर रोक
अदालत ने विवादित जमीन को लेकर सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि न तो इस जमीन की बिक्री की जाए और न ही उस पर किसी तरह का बोझ या थर्ड-पार्टी अधिकार बनाया जाए। इसके साथ ही जमीन पर किसी भी प्रकार के नए निर्माण पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि मौजूदा रिहायशी घरों को छोड़कर सभी खाली जमीन को वन विभाग और संबंधित जिला कलेक्टर अपने कब्जे में लें।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 5 जनवरी तक रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए थे। अब इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे की सख्त कार्रवाई कर सकती है।

