अल्मोड़ा डेस्क l देवभूमि उत्तराखण्ड जहां देवों की स्थली के लिए ख्यात है, वहीं यहां की संस्कृति, तीज , त्यौहार , परम्परायें देश दुनिया में इसको विशेष पहचान दिलाती है। उत्तराखण्ड के खासकर कुमाऊॅ क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य छोलिया की भी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। नृतकों की वेशभूषा और उनके हाथ लहराते ढाल तलवारें को देखकर यह सजह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह नृत्य एक युद्धपरक नृत्य का प्रतीक है। आज इस लोकनृत्य का प्रदर्शन यहां शादी विवाहों में किया जाता है।

माना जाता है कि पुराने समय की राजाओं की बारातों में वर पक्ष वाले राजा के सैनिक युद्धकला के अभ्यास का कलात्मक प्रदर्शन करते हुए आगे आगे चला करते थे। जो धीरे धीरे आज भी परम्परा का हिस्सा बना हुआ है। छोलिया को उसी परम्परा का हिस्सा माना जाता है। कुछ विद्वानों का यह भी माना है कि छोलिया नृत्य की शुरूआत खस राजाओं के के समय हुई थी। जब विवाह तलवार की नोक पर होते थे। छोलिया नृत्य को लेकर यह भी धारणा कि यह बुरी आत्माओं से बारातियों को सुरक्षा प्रदान करता है। आज भी यह कुमाऊॅ क्षेत्र में शादी विवाह के वक्त इस नृत्य कला का प्रदर्शन किया जाता है। इस नर्तक टोली के साथ संगीतकारों का एक दल अलग से चलता है जो मशकबीन , तुरही, ढोल, दमाऊ और रणसिंघा जैसे लोक वाद्य बजाते हुए चलते हैं। संगीत और नृत्य की जुगलबंदी वाली यह पुरानी विद्या अब विवाहों बारातों तक सीमित हो कर रह गई है। नृतको का शारीरिक कौशल इस कला में इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उन्हें युद्धरत सैनिकों के उन दांव पेचों की नकल करनी होती जिसमें वह पलभर में चकमा देकर अपने शत्रु को पराजित कर सके। कुछ इसी तरह वह आज भी शादी विवाह में नाचते नाचते तलवारों को लहराते हुए आपस में लड़ाई की मुद्रा भी दिखाते रहते हैं। नर्तकों की टोली के आगे सफेद और लाल रंग के ध्वजों को ले जाने की भी रिवायत रही है जिन्हें निसाण कहा जाता है

छोलिया नृत्य के कलाकार बताते हैं कि नर्तकों को गति दने के उद्देश्य से उनके कई तरह की तालें होती हैं, जिन्हें अलग अलग समय के लिए नियत किया गया है। तो इस नृत्य की रफ्तार को नियंत्रित करने काम मुख्य ढोल वादक का ही होता है। इस नृत्य टोली में कम से आधा दर्जन लोग अधिकतम एक दर्जन से ज्यादा होते हैं।

अल्मोड़ा में पिछले 30 सालों से ज्यादा समय से छोलिया नृत्य की टीम चला रहे संस्कृतिकर्मी चंदन बोरा बताते हैं कि यह जैसा कि यह इस नृत्य की वेशभूषा और हाथों में तलवार ढाल को देखकर ही लगता है कि यह परम्परा राजाओं के वक्त से चली आ रही है। राजाओं के समय में सैनिक इसी परम्परागत वेशभूषा में तलवार लहराते हुए विजित होकर आते थे। चन्दन बोरा बताते है कि वह विगत लम्बे समय से इस सांस्कृतिक दल को चला रहे हैं लेकिन इस कला के जानकार कलाकारों के सामने आज रोजी रोटी का संकट है। यह परम्परा आज आधुनिकता के दौड़ में धीरे धीरे खत्म होती जा रही है। सरकारों की तरफ से इसके संवर्द्धन और संरक्षण के लिए कुछ विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
