मां चंद्रघंटा की कथा: आज नवरात्रि का तीसरा दिन है, जो कि चंद्रघंटा माता को समर्पित है। इस दिन माता रानी के चंद्रघंटा स्वरूप की आराधना कर व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता चंद्रघंटा को राक्षसों की वध करने वाला कहा जाता है। ऐसा माना जाता है मां ने अपने भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा रखा हुआ है। माता चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र बना हुआ है, जिस वजह से भक्त मां को चंद्रघंटा कहते हैं। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की कथा का पाठ जरूर करना चाहिए।
मां चंद्रघंटा का स्वरूप
धर्म शास्त्रों के अनुसार, मां चंद्रघंटा ने राक्षसों के संहार के लिए अवतार लिया था। इनमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों की शक्तियां समाहित हैं। ये अपने हाथों में तलवार, त्रिशूल, धनुष व गदा धारण करती हैं। इनके माथे पर घंटे के आकार में अर्द्ध चंद्र विराजमान है। इसलिए ये चंद्रघंटा कहलाती हैं। भक्तों के लिए माता का ये स्वरूप सौम्य और शांत है।
नवरात्रि के तीसरे दिन की कथा:
हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र की शुरुआत होती है। इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत 22 सितंबर से हो चुकी है। इस उत्सव के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि घर में मां चंद्रघंटा के आगमन से सुख-शांति का आगमन होता है। चंद्रघंटा माता को स्वर की देवी भी कहा जाता है, जो सिंह पर सवार होकर असुरों और दुष्टों को दूर करती हैं। नवरात्रि के तीसरे दिन व्रती को मां चंद्रघंटा की पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए।
देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेव बहुत क्रोधित हुए और उनके क्रोध से एक दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई। इस ऊर्जा से मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप का जन्म हुआ, जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है।इसी वजह से उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा।
भगवान शिव ने मां चंद्रघंटा को अपना त्रिशूल भगवान विष्णु ने अपना चक्र और देवराज इंद्र ने अपना घंटा प्रदान किया। इसके बाद अन्य सभी देवताओं ने भी मां को अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दे दिए। फिर मां चंद्रघंटा महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं और माता ने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ महिषासुर का वध किया, जिससे देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली।
चंद्रघंटा माता की आरती
जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम।पूर्ण कीजो मेरे काम॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती।चन्द्र तेज किरणों में समाती॥
मन की मालक मन भाती हो।चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥
सुन्दर भाव को लाने वाली।हर संकट में बचाने वाली॥
हर बुधवार को तुझे ध्याये।श्रद्धा सहित तो विनय सुनाए॥
मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।सन्मुख घी की ज्योत जलाएं॥
शीश झुका कहे मन की बाता।पूर्ण आस करो जगत दाता॥
कांचीपुर स्थान तुम्हारा।कर्नाटिका में मान तुम्हारा॥
नाम तेरा रटू महारानी।भक्त की रक्षा करो भवानी॥
