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    काफल पाको मैं नि चाखो:तो इस गर्मी खाइये, जानिए इसके फायदे और कहावत के पीछे की कहानी

    काफल पाको मैं नि चाखो:तो इस गर्मी खाइये, जानिए इसके फायदे और कहावत के पीछे की कहानी


    उत्तराखंड- चैत्त,बैशाख, ज्येष्ठ के इन तीन महीने में जंगलों में उगने वाले फलो में हिसालु,किरमोड,किम,व्योडू, के साथ साथ एक काफल फल भी है। काफल चैत्र मास से फल देना शुरू कर देता है। लास्ट ज्येष्ठ तक काफल का फ़ल जंगलों में मिलता है।
    ये काफल फल उतराखड के अलावा हिमाचल व नेपाल के जंगलों में पाया जाता हैं। उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों के बनों में काफल चैत्र मास से ज्येष्ठ तक पकता है।
    ये काफल फल से दो तीन महीने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार मिल जाता है हमारे उतराखड व हिमाचल प्रदेश के लोगों के द्धारा ये काफल इन दिनों अलग अलग राज्यों के लोगों व बहारी टूरिस्ट लोगों बेचा जाता है।
    काफल का फ़ल के फायदें

    ●काफल एक एंटीऑक्सीडेंट है जो प्रकृति में पाया जाता है। लोक चिकित्सा में, इसका उपयोग अक्सर खांसी, पुरानी ब्रोंकाइटिस, अल्सर, एनीमिया, बुखार, दस्त और कान, नाक और गले की समस्याओं के इलाज के लिए किया जाता है।

    ● काफल की छाल एक अच्छा एंटी-एलर्जी हो सकता है क्योंकि इसका उपयोग कई एलर्जी को ठीक करने के लिए किया जाता है। 

    ● काफल के पेड़ की छाल को सिर्फ दांतों के बीच में रखकर दो-तीन मिनट तक चबाने से दांत दर्द से राहत मिल सकती है। 

    ● काफल के काढ़े से गरारे करने से गले का संक्रमण और घेंघा भी ठीक हो सकता है। 


    काफल के लिए प्रसिद्ध कहावत

    प्रताप सिंह नेगी समाजिक कार्यकर्ता बताते है कि काफल फल के बारे में एक कहावत है आज भी इस कहावत प्रत्यक्ष प्रमाण देखने को मिलता है।
    जंगलों में इस समय एक पक्षी बोलती काफल पाको, दूसरी पक्षी बोलती है मैंने ना चाखो।
    प्राचीन काल में एक ग़रीब परिवार की महिला काफल के सीजन में जंगलों से काफल तोड़कर अपनी बेटी व अपने घर परिवार का दिनचर्या चलाती थी।एक दिन क्या हुआ व महिला प्रातः काल जंगलों से काफल तोड़कर टोकरी में रख गई और गेहूं के खेत से कुछ घास व चारा लेने गई अपनी लड़की को बोल गई बेटी ये काफल की टोकरी का ध्यान देना और इसमें से काफल मत खाना में खेत से आ रही हूं ।शाम को काफल बेचने जायेगे लड़की ने अपना मन मारकर काफल नहीं चखे वैसे भी भूखी थी सो गई ,जब माँ खेत से घास व चारा लाई तो दोपहर का टाइम था काफल की टोकरी में धूप से काफल कम हो गए तो मां को अपनी लड़की पर शक हुआ गहरी नींद में सोई हुई लड़की जोर से पीठ में मारा, तो लड़की को पूछा तूने काफल क्यों खाए। मैं तुझे काफल की टोकरी को देखने को बोल गई थी। लड़की ने अपने मरे बाप की कसम खाई मां मैंने काफल नहीं खाये। मां ने फिर लड़की को इधर पटका उधर पटका और लड़की मर गई।जब लड़की मर गयी तो मां को अफ़सोस हुआ शाम के टाइम धूप कम होने से काफल की टोकरी फिर भर गई। मां को लड़की मारने पर अफ़सोस के कारण अपने प्राण भी त्याग दिए।
    उसके बाद ये मां व बेटी दोनों पक्षी के रूप में जन्म लिए आज भी जंगलों एक पक्षी काफल पाक़ो और एक पक्षी मैनै ना चाखो करके बोलती है।

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