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    वीर योद्धा लचित बोरफुकन पर बना विश्व रिकॉर्ड, जानिए इनके बारे में विस्तार से

    लचित को पूर्वोत्तर का शिवाजी भी कहा जाता रहा है। छत्रपति शिवाजी का उपनाम लगना ही पर्याप्त है यह बताने के लिए कि लचित की वीरता किस कदर जनमानस में प्रभावी थी।


    रातों-रात मुगल सेना के करीब 4,000 सैनिकों के प्राण लेकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की

    सरकार ने बीते वर्ष में एक पोर्टल और एक एप की शुरुआत की थी जिसके जरिए सरकार ने लोगों से लचित बोरफुकन के जीवन से जुड़ी प्रविष्टियां मांगी थी।

    पिछले साल नवंबर में PM मोदी की मौजूदगी में मनाई गई थी लचित की 400 वीं वर्षगांठ

    ज्ञात हो, असम सरकार ने पिछले साल नवंबर में लचित बोरफुकन पर कार्यक्रमों की एक श्रृंखला के साथ लचित बोरफुकन की 400वीं जयंती समारोह के समापन को चिह्नित किया था। यह समापन समारोह नई दिल्ली में आयोजित किया गया था और इसमें पीएम मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भाग लिया था।

    PM मोदी ने लोगों को दिलाई थी बोरफुकन की याद

    तब पीएम मोदी ने कहा था कि ”भारत का इतिहास सिर्फ गुलामी का इतिहास नहीं है। भारत का इतिहास योद्धाओं का इतिहास है, विजय का इतिहास है।” आज पीएम मोदी के इन्हीं शब्दों को सार्थक बनाया है 42 लाख से अधिक उन हस्तलिखित निबंधों ने जो बोरफुकन की बहादुरी के किस्सों से हमें रूबरू कराते हैं।

    बहादुर अहोम (असम) जनरल लचित पर हस्तलिखित नोटों का सबसे बड़ा ऑनलाइन फोटो एल्बम

    केवल इतना ही नहीं बहादुर अहोम (असम) जनरल लचित बोरफुकन पर लिखे गए 42 लाख से अधिक निबंधों के संकलन को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा “हस्तलिखित नोटों का सबसे बड़ा ऑनलाइन फोटो एल्बम” के रूप में मान्यता भी दी गई है।

    गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अधिनिर्णायक स्वप्निल डांगरिकर ने इस सम्बंध में 9 मार्च, 2023 को असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को मान्यता का आधिकारिक पत्र सौंपा। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “हमें 57 लाख प्रविष्टियां मिली थीं, लेकिन केवल हस्तलिखित प्रविष्टियों पर ही विचार किया गया था। गुणवत्ता ऑडिट और अन्य प्रक्रियाओं के बाद निबंधों की अंतिम गणना 42,94,350 थी।”

    उन्होंने आगे जोड़ते हुए कहा, “इस अप्रैल में, हम अपने बिहू नृत्य (एक लोक नृत्य रूप) को रिकॉर्ड बुक में नर्तकों के सबसे बड़े समूह के साथ दर्ज करने की कोशिश करेंगे। हम बोडो के ‘बागुरूम्बा’ नृत्य और ‘खोल’ (पारंपरिक ड्रम) को भी रिकॉर्ड बुक में शामिल करने की योजना बना रहे हैं।

    वीर योद्धा लचित बोरफुकन पर बना विश्व रिकॉर्ड

    अहोम (असम) साम्राज्य के महान योद्धा लचित बोरफुकन को ब्रह्मपुत्र पर 1671 की ‘सरायघाट की लड़ाई’ में उनके विशेष नेतृत्व के लिए जाना जाता है। उन्होंने असम को वापस लेने के लिए  शक्तिशाली मुगल सेना के प्रयास को विफल कर दिया था।

    बोरफुकन की 400वीं जयंती का समारोह एक राष्ट्रीय कार्यक्रम में बदल गया

    उन्होंने कहा कि वीर लाचित बोरफुकन की 400वीं जयंती का समारोह एक राष्ट्रीय कार्यक्रम में बदल गया है, जिसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और केंद्रीय वित्त मंत्री जैसे गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों को कार्यक्रम से जोड़ने से इस आयोजन की गरिमा और इसका महत्व बढ़ता है। डॉ. सरमा ने कहा कि विज्ञान भवन, नई दिल्ली में प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया भाषण सभी के दिलों को छू गया।

    असम के सीएम डॉ. सरमा ने कहा कि राज्य सरकार ने अलाबोई लड़ाई के स्मारक और लचित बोरफुकन के समाधिक्षेत्र के संरक्षण और नवीनीकरण के लिए पहले ही कार्रवाई शुरू कर दी है ताकि वीर लाचित और उनके देशभक्त सैनिकों को वैश्विक समुदाय के बारे में जानने के लिए एक व्यापक मंच पर रखा जा सके। उन्होंने कहा कि 150 फीट ऊंची लाचित बोरफुकन की प्रतिमा लगाने का काम एक साल के भीतर पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि पान बाजार के पुराने पुलिस आयुक्त कार्यालय के स्थल पर नदी के किनारे सौंदर्यीकरण की परियोजना चल रही है, जिसमें सरायघाट युद्ध का स्मारक होगा और उस लड़ाई में भाग लेने वाले आहोम नायकों के नाम बताते हुए तथ्यात्मक साक्ष्य दिए जाएंगे।

    दरअसल, वीर लाचित बोरफुकन को उनकी 400वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए असम सरकार ने एक साल तक कार्यक्रम मनाने का फैसला किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 25 फरवरी, 2022 को गुवाहाटी में महावीर लाचित की 400वीं जयंती समारोह का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री डॉ. सरमा ने 26 अक्टूबर, 2022 को एक वेब पोर्टल, एप लॉन्च किया था।

    25 से अधिक भाषाओं में की गई प्रविष्टियां पोर्टल पर अपलोड

    बता दें, 25 से अधिक भाषाओं में की गई प्रविष्टियां पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में एक पोर्टल पर अपलोड की गई थीं, जिसे बोरफुकन की 400वीं जयंती समारोह के हिस्से के रूप में लॉन्च किया गया था। विश्व रिकॉर्ड के लिए केवल हस्तलिखित प्रविष्टियों पर विचार किया गया। इसके पश्चात यह कारवां आगे बढ़ता गया और आज वर्ल्ड रिकॉर्ड में तब्दील हो चुका है। ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं कि लचित बोरफुकन कौन हैं जिनके नाम पर वर्ल्ड रिकॉर्ड बन गया है।

    असम के ‘शिवाजी’ के नाम से मशहूर

    ऐसा क्या कारण रहा है जिसकी वजह से उन्हें ‘पूर्वोत्तर का शिवाजी’ कहा गया ? दरअसल, लचित बोरफुकन का असली नाम लचित था जबकि बोरफुकन उनकी उपाधि थी। लचित को पूर्वोत्तर का शिवाजी भी कहा जाता रहा है। छत्रपति शिवाजी का उपनाम लगना ही पर्याप्त है यह बताने के लिए कि लचित की वीरता किस कदर जनमानस में प्रभावी थी। यही कारण है कि आज भी 24 नवंबर को बोरफुकन और असमिया सेना के प्रदर्शन को सराय घाट के युद्ध के रूप में याद करते हुए लचित दिवस मनाया जाता है। केवल इतना ही नहीं, नेशनल डिफेंस एकेडमी में बेस्ट कैडेट को दिया जाने वाला गोल्ड मेडल आज भी “लचित मेडल” के नाम से दिया जाता है। भारत के इतिहास में लचित बोरफुकन के नाम से ऐसी ही अनेक घटनाएं दर्ज हैं। इनमें सबसे प्रमुख रहा ‘सरायघाट का युद्ध’।

    सरायघाट के युद्ध में क्या हुआ था ?

    17वीं शताब्दी में पूर्व में अपने साम्राज्य का विस्तार करने के इच्छुक मुगलों और अहोमों के बीच कई झड़प देखने को मिली। जिनका राज्य असम में ब्रह्मपुत्र घाटी तक फैला हुआ था और लगभग 600 वर्षों तक बना रहा। गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के तट पर लड़ी गई सरायघाट की लड़ाई के दौरान बोरफुकन अहोम सेनाओं के कमांडर थे। मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल के दौरान हुई लड़ाई को निर्णायक अहोम जीत के रूप में देखा गया।

    रातों-रात मुगल सेना के करीब 4,000 सैनिकों के प्राण लेकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की

    इतिहासकार बताते हैं कि यह वो दौर था जब मुगलों को मौत के घाट उतारने के लिए हिंदू स्वराज्य का हर योद्धा तत्पर था और किसी भी तरह से स्वतंत्र भारत की भूमि को बाहरी आक्रमणकारियों से मुक्त कराना चाहता था। देश में मुगलों के आतंक का सामना जहां उत्तर-पश्चिम भारत में महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजस्थान की राजपूत सेना ने किया था, तो वहीं दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलिया हुकूमत की धज्जियां उड़ाई थी। वहीं भारत के उत्तर-पूर्वी कोने पर भी हिंदू स्वराज्य की सेना अपने स्तर से मुगलों के मंसूबों को नाकाम करने में लगी थी और वहां विद्रोह का नेतृत्व कर रहे थें लचित बोरफुकन। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य असम में होने वाले सरायघाट के युद्ध के बारे कौन नहीं जानता, जिसमें रातों-रात मुगल सेना के करीब 4,000 सैनिकों के प्राण लेकर अपनी मातृभूमि की रक्षा की गई थी।

    सराय घाट असम में गुवाहाटी की ब्रह्मपुत्र नदी का वो हिस्सा है जहां लचित ने लड़ी ऐतिहासिक लड़ाई

    सराय घाट असम में गुवाहाटी की ब्रह्मपुत्र नदी का वो हिस्सा है जहां लचित बोरफुकन ने मुगल सेना के साथ ये ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी। 16वीं सदी में इसी स्थान पर सेनापति बोरफुकन के नेतृत्व में अहोम हिंदू साम्राज्य ने मुगलों को धूल चटाई थी। गुवाहाटी के आसपास पूरे क्षेत्र में फैले इस साम्राज्य का वर्चस्व इतना था कि मुगल सेना कई बार इसको जीतने के मंसूबे से आई लेकिन मुंह की खाकर उल्टे पांव लौट गई।

    अहोम हिंदू साम्राज्य ने औरंगजेब को चुनौती देते हुए औरंगजेब के कब्जे से गुवाहाटी का ईटाकुली किला भी छीन लिया था। औरंगजेब की सेना बुरी तरीके से हार गई थी जिससे औरंगजेब बिलबिला उठा था। उस किले को वापस हासिल करने के लिए 1671 में फिर से मुगल सेना ने होम हिंदू साम्राज्य की तरफ अपने कदम बढ़ाए थे, लेकिन लचित के नेतृत्व ने उन बढ़े हुए कदमों को काटकर ब्रह्मपुत्र नदी में बहा दिया गया।

    लचित के कुशल नेतृत्व की नहीं थी कोई बराबरी

    इसमें कोई दो राय नहीं थी कि लचित एक कुशल सेनापति थे और बेहद बहादुर थे। लचित की अहोम सेना में महज 6,000 सैनिकों के साथ, मजबूत नौसेना और कुशल जासूसों का एक पूरा जत्था था। जहां एक तरफ असम के जंगलों में उसे कोई परास्त नहीं कर सकता था, तो वहीं दूसरी तरफ ब्रह्मपुत्र की धारा लचित के इशारों पर दिशा बदलती थी। मुगलों के आक्रमण को रोकते हुए लचित की महज 6,000 की सेना ने जो युद्ध कौशल दिखाया उससे मुगल सेना के अग्रिम पंक्ति में खड़े हजारों सैनिक ब्रह्मपुत्र नदी की भेंट चढ़ गए। बची हुई सेना जान बचाकर मानस नदी पार कर भाग खड़ी हुई थी।

    इसमें सबसे ज्यादा कारगर रही लचित की नौसेना में मौजूद छोटे-छोटे नाव, जिसे बच्छारीना कहा जाता था। छोटे-छोटे नाव मुगलों के बड़े जहाजों पर बहुत भारी साबित हुए। जानकार बताते हैं कि सराय घाट का युद्ध ब्रह्मपुत्र नदी के धार में एक त्रिभुज से घिर गया था। जिसमें एक तरफ कामाख्या देवी का मंदिर, दूसरी तरफ अश्वक्लांता का विष्णु मंत्र और तीसरी तरफ ईटाकुली किले की दीवारें थी। अहोम हिंदू साम्राज्य पर राज करने के मंसूबे से आए मुगलों को इस त्रिभुज में घेर कर मारा गया था और युद्ध के मैदान से डराकर खदेड़ दिया गया था।

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