उत्तराखंड भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील जोन-छह में शामिल

उत्तराखंड को भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील जोन-छह में शामिल किया गया है। इससे पहले राज्य के जिलों को जोन चार और पांच में विभाजित किया गया था। अब भारतीय मानक ब्यूरो ने डिजाइन भूकंपीय जोखिम संरचनाओं के भूकंपरोधी डिजाइन के मानदंड रीति संहिता-2025 में नया भूकंपीय क्षेत्रीकरण मानचित्र जारी किया है। इसमें उत्तराखंड समेत अन्य हिमालीय राज्यों को भी भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील जोन छह में रखा गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इससे पूरे राज्य में निर्माण कार्यों के लिए लोगों को अधिक सजग होना होगा।

वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के निदेशक विनीत गहलोत के अनुसार, भारतीय मानक ब्यूरो भूकंपीय जोनिंग मानचित्र जारी करता है। इससे पहले वर्ष-2016 में इसे जारी किया गया था। अब करीब नाै वर्ष बाद जारी नए मानचित्र में सभी पहाड़ी राज्यों को समान रूप से जोन छह में शामिल किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि भूकंप की दृष्टि से जो खतरा जम्मू-कश्मीर में है, वही उत्तराखंड में भी है। निदेशक गहलोत कहते हैं कि बड़े डैम, सड़क, इमारत आदि के निर्माण में इसका महत्वपूर्ण रोल होता है। अब पहाड़ी राज्यों के भीतर निर्माण कार्य में एकरूपता आएगी। इससे पहले जोन पांच में शामिल रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ भूकंप की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील जिले थे।

श्रीनगर गढ़वाल केंद्रीय विवि के भूगर्भ विभाग के विभागाध्यक्ष एमपीएस बिष्ट कहते हैं कि पृथ्वी की दृष्टि से हिमालय में कोई बहुत अंतर नहीं होता है। उनकी चट्टान, बाउंड्री, प्लेट आदि एक जैसी ही होती है। पहले जोनिंग हुई थी, उसमें राज्य को दो जोन में रखा गया था। अब एक ही जोन (छह) में रखा गया है। इसकी संवेदनशीलता बढ़ा दी गई है। ऐसे में हमें अधिक सजग होना होगा। उन्होंने बताया कि भूकंप की पूर्व घटना, तीव्रता समेत अन्य पहलुओं को शामिल करते हुए भूकंप की जोनिंग होती है।

राज्य में सेंसरों, सायरनों की संख्या बढ़ाई जाएगी

भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच लगातार टकराव होता रहता है। इसके चलते भूकंप को लेकर संवेदनशीलता बनी रहती है। राज्य में 1911 से रिक्टर स्केल पर छह की तीव्रता से अधिक के 11 बड़े भूकंप आ चुके हैं। अब भूकंप के खतरे के दृष्टिगत राज्य में सेंसरों, सायरनों की संख्या बढ़ाने समेत अन्य कदम उठाए जाएंगे।

 

 

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