पितृ पक्ष (सोल्ह श्राद्ब) पूर्णिमा से शुरु होते हैं और अमावस्या को इसका समापन होता है। हर साल भाद्रपक्ष में सोल्ह श्राद्ब व पितृ पक्ष एक बार आते हैं। हिंन्दू सनातन धर्म में जैसे अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।ऐसे ही साल में सोल्ह श्राद्ध व पितृ पक्ष भी एक महत्वपूर्ण पवित्र अनुष्ठानों में माना जाता है।
अष्टमी श्राद्ध कब है : पितृपक्ष की अष्टमी तिथि का श्राद्ध 14 सितंबर 2025 को किया जाएगा।
नवमी श्राद्ध कब है : जिन पितरों की तिथि नवमी है, उनके लिए 15 सितंबर 2025 को श्राद्ध करना उचित रहेगा।
अष्टमी व नौवमी का श्राद्ब अत्यधिक महत्वपूर्ण
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पौराणिक शास्त्रों के अनुसार अष्ठमी व नौवमी का श्राद्ब अत्यधिक महत्वपूर्ण है।अष्टमी को पिता का श्राद्ब,नौवमी को माता का श्राद्ध किया जाता है।
अष्टमी (पिता का श्राद्ध): इस दिन पिता की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है। यह दिन पिता के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।
– नवमी (माता का श्राद्ध): इस दिन माता की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध किया जाता है। यह दिन माता के प्रति प्रेम, सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है।
इन दोनों दिनों पर श्राद्ध करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और परिवार के सदस्यों को भी आध्यात्मिक लाभ और पितरों का आशीर्वाद मिलता है।
चतुर्दशी श्राद्ध उन पूर्वजों का किया जाता है।जिनका देहांत दुर्घटना आग,बाढ़, या किसी हत्या से हुआ हो ।वहीं
जिन पूर्वजों की देहांत कि तिथि मालूम नही हो उनका श्राद्ध व पिंड दान अमावस्या को दिया जाता है।
पितृ पक्ष का इतिहास (पौरणिक कथा)
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प्राचीन भारतीय इतिहास के अनुसार, जब महाभारत के युद्ध के दौरान कर्ण का निधन हो गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई, तो उन्हें नियमित भोजन नहीं मिला। इसके बदले में उसे खाने के लिए सोना और गहने दिए गए। उसकी आत्मा निराश हो गई और उसने इस बात को भगवान इंद्र (स्वर्ग के भगवान) को बताया कि उसे वास्तविक भोजन क्यों नहीं दिया जा रहा है? तब भगवान इंद्र ने वास्तविक कारण का खुलासा किया कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में इन सभी चीजों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को नहीं दिया। तब कर्ण ने उत्तर दिया कि वह अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानता है और उसे सुनने के बाद, भगवान इंद्र ने उसे 15 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके। 15 दिनों की इस अवधि को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है।
श्राद्ध कैसे मनाते हैं
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एक दिन पहले उपवास रखा जाता है अगले दिन श्राद्ब के दिन पंडित को बुलाकर विधि विधान से अपने औसत अनुसार पंडित को कपडे़,चावल,दाल, दान दक्षिणा आदि देकर अपने पितरों का श्राद्ध किया जाता है।

