फूलदेई, छम्मा देई, आज है बच्चों का पसंदीदा लोकपर्व फूलदेई, जानिए इस लोक बालपर्व के बारें में
फूलदेई त्योहार बच्चों द्वारा मनाए जाने के कारण इसे लोक बाल पर्व भी कहते हैं।
गढ़वाल में इसे फूल संक्रांत बोलते हैं ।
फूलदेई पारंपरिक त्यौहार चैत्र मास के संक्रान्ति के पहले दिन हर साल उत्तराखंड में धूम धाम से मनाया जाता है। प्रकृति के साथ मनाया जाने वाला अदभुत पर्व इस वर्ष 15 मार्च को हैं।
पर्वतीय महापरिषद के महासचिव महेंद्र सिंह रावत बताते है कि उत्तराखंड के मानसखंड कुमाऊं क्षेत्र में उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकपर्व फूलदेई पर छोटे छोटे बच्चे पहले दिन अच्छे ताज़े फूल वन से तोड़ के लाते हैं। जिनमे विशेष प्योंली के फूल और बुरॉश के फूल का प्रयोग करते हैं। इस दिन गृहणियां सुबह सुबह उठ कर साफ सफाई कर चौखट को ताजे गोबर मिट्टी से लीप कर शुद्ध कर देती है। फूलदेई के दिन सुबह सुबह छोटे छोटे बच्चे अपने वर्तनों में फूल एवं चावल रख कर घर घर जाते हैं । और सब के दरवाजे पर फूल चढ़ा कर फूलदेई के गीत , फूलदेई छम्मा देई दैणी द्वार भर भकार !! ” गाते हैं। और लोग उन्हें बदले में चावल गुड़ और पैसे देते हैं। छोटे छोटे देवतुल्य बच्चे सभी की देहरी में फूल डाल कर शुभता और समृधि की मंगलकामना करते हैं। इस पर गृहणियां उनकी थाली में ,गुड़ और पैसे रखती हैं। बच्चों को फूलदेई में जो आशीष और प्यार स्वरूप में जो भेंट मिलती है ,उससे अलग अलग स्थानों में अलग अलग पकवान बनाये जाते हैं। फूलदेई से प्राप्त चावलों को भिगा दिया जाता है। और प्राप्त गुड़ को मिलाकर ,और पैसों से घी / तेल खरीदकर ,बच्चों के लिए हलवा ,छोई , शाइ , नामक स्थानीय पकवान बनाये जाते हैं। कुमाऊं के भोटान्तिक क्षेत्रों में चावल की पिठ्ठी और गुड़ से साया नामक विशेष पकवान बनाया जाता है।
उत्तराखंड के केदारखंड अर्थात गढ़वाल मंडल में यह त्यौहार पुरे महीने चलता है। यहाँ बच्चे फाल्गुन के अंतिम दिन अपनी फूल कंडियों में युली ,बुरांस ,सरसों ,लया ,आड़ू ,पैयां ,सेमल ,खुबानी और भिन्न -भिन्न प्रकार के फूलों को लाकर उनमे पानी के छींटे डालकर खुले स्थान पर रख देते हैं। अगले दिन सुबह उठकर प्योली के पीताम्भ फूलों के लिए अपनी कंडियां लेकर निकल पड़ते हैं। और मार्ग में आते जाते वे ये गीत गाते हैं। ”ओ फुलारी घौर। झै माता का भौंर। क्यौलिदिदी फुलकंडी गौर। ” प्योंली और बुरांश के फूल अपने फूलों में मिलकर सभी बच्चे ,आस पास के दरवाजों ,देहरियों को सजा देते है। और सुख समृद्धि की मंगल कामनाएं करते हैं। फूल लाने और दरवाजों पर सजाने का यह कार्यक्रम पुरे चैत्र मास में चलता रहता है। अंतिम दिन बच्चे घोघा माता की डोली की पूजा करके विदाई करके यह त्योहार सम्पन्न करते हैं। वहाँ फूलदेई खेलने वाले बच्चों को फुलारी कहा जाता है। गढ़वाल क्षेत्र में बच्चो को जो गुड़ चावल मिलते हैं,उनका अंतिम दिन भोग बना कर घोघा माता को भोग लगाया जाता है। घोघा माता को फूलों की देवी माना जाता है। घोघा माता की पूजा केवल बच्चे ही कर सकते हैं। फुलारी त्योहार के अंतिम दिन बच्चे घोघा माता का डोला सजाकर, उनको भोग लगाकर उनकी पूजा करते हैं।
पर्वतीय लोक संस्कृति के अनुपम त्यौहार को पर्वतीय महापरिषद की क्षेत्रीय शाखाएं अपने-अपने क्षेत्रों में मना रही है जिसके माध्यम से बच्चों को अपनी गौरवशाली परंपराओं संस्कृति व संस्कारों को निकट से जानने का अवसर प्राप्त होगा। हमारी भावी पीढ़ी प्रकृति से प्रेम जुड़ाव व प्रगाढ़ता को आत्मसात कर सकेगी। आइए हम सब मिलकर अपने बच्चों को चावल और फूल देकर कम से कम अपनी और आस-पड़ोस की देहरी ओं को मंगल कामनाओं से सजाने का यह पुनीत परंपरागत कार्य करें।
फूलदेई छमा देई ।
जदुगै दियला,उदुगै होई।
सबने देये गुडकि डयि जदुगै दियला उदुगै होई।
प्रताप सिंह नेगी समाजिक कार्यकर्ता ने बताया चैत्र मास के पहले दिन संक्रांति के दिन यह फूलदेई पारंपरिक त्यौहार हिन्दू धर्म के नये साल के स्वागत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। फूलदेई के त्यौहार के बाद नये साल की शुरुआत होती है। नेगी ने कहा जैसे और त्यौहारों में धीरे धीरे गिरावट आती जा रही है ऐसे फूलदेई त्यौहार में बहुत सी गिरावट आती जा रही है।
छोटे छोटे बच्चो द्वारा मनाया जाता है। यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक पर्व है। फूलदेई त्योहार बच्चों द्वारा मनाए जाने के कारण इसे लोक बाल पर्व भी कहते हैं। प्रसिद्ध त्योहार फूलदेई चैैत्र मास के प्रथम तिथि को मनाया जाता है। अर्थात प्रत्येक वर्ष मार्च 14 या 15 तारीख को यह त्योहार मनाया जाता है। फूल सग्यान ,फूल संग्रात या मीन संक्रांति उत्तराखंड के दोनों मंडलों में मनाई जाती है। कुमाऊं गढ़वाल में इसे फूलदेई और जौनसार में गोगा कहा जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में सौर कैलेंडर का उपयोग किया जाता है। इसलिए इन क्षेत्रों में हिन्दू नव वर्ष का प्रथम दिन मीन संक्रांति अर्थात फूल देइ से शुरू होता है। चैत्र मास में बसंत ऋतु का आगमन हुआ रहता है। प्रकृति अपने सबसे बेहतरीन रूप में विचरण कर रही होती है। और बच्चों के चहकने से धरती गूँज उठती हैं।
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
बार मेना में आ रेचो त्यार
नंतिना अर्ना देहि
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
फूली बिरुडी आड़ू खुमानी
बुराशी फूली उची दानी
फूली बिरुडी आड़ू खुमानी
बुराशी फूली उची दानी
पेली टायर पंचमी की आलो
लग्लो चेत फागुन झालो
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
चैत को मैण, एक पैट,
चेली को सुर पराण मैत
चैत को मैण, एक पैट,
चेली को सुर पराण मैत
फुल खज़ भेटोली आली
रंगलो लगी गो चे चेट
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
नंदिनो की फुलो की थाई
गा ओमिजी आरे फुलो दीवाई
नंदिनो की फुलो की थाई
गा ओमिजी आरे फुलो दीवाई
छाव भारी थाई हरनेने
हाथ मुझे लेरे गुड के ढी
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥
फूल देई, छम्मा देई ।
जतुके दियाला, उतुके सई ॥