होली का त्योहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। हर सूबे की एक खास होली होती है जिस वजह से उसका अपना ही आकर्षण होता है। पुष्कर में जहां कपड़ा फाड़ होली खेली जाती है, वहीं ब्रज की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है। उसी तरह से पहाड़ी सूबे उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की होली का भी अपना ही आकर्षण है। खासकर अल्मोड़ा की बैठकी होली जो विश्वभर में प्रसिद्ध है। अल्मोड़ा उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी है। यहां की होली को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक आते हैं।
सोमवार को कुमाऊं के वृंदावन विद्यवासिनी (बानड़ीदेवी) के दरबार में उच्चयूर व बिसौत पट्टी के करीब 25 गांवों के होल्यारों का रेला उमड़ा। बारी बारी मां बानड़ीदेवी के ऐतिहासिक मंदिर की परिक्रमा कर प्राचीन परंपरा निभाई गई। फिर द्वि ढाई लटक (झोड़ा नृत्य में कदमताल की शैली) के साथ ब्रज व अवधी बोली के बेजोड़ संगम में रचीबसी होली गीतों से समा बांध दिया।



देर शाम तक मिश्रित वनक्षेत्र वाले वृंदावन के शिखर पर बानड़ी देवी के पौराणिक मंदिर में होली गीत गूंजते रहे। यहां असोटा, सिलखोड़ा, उसेटी, भैसोड़ा, तुलेड़ी,सत्यों, बैजीटाना, अनरियाकोट, ढौरा, खेरदा, पलना, निषिणीं, जोशीधुरा समेत 25 से ज्यादा गांवों के होल्यार वर्षों से होली खेलने की रस्म निभाने पहुंचते हैं। पलायन के बावजूद असोटा, सिलखोड़ा, तुलेड़ी आदि गांवों के लोग पुरानी परंपरा को जीवंत रखे हैं।
बानडी देवी मंदिर अल्मोड़ा-लामगडा रोड पर अल्मोड़ा से 26 किलोमीटर दूर स्थित है। हालांकि, 26 किमी से बाद, लगभग दस किलोमीटर तक ट्रेक करना पड़ता है और इसलिए इस मंदिर तक पहुंचने में बहुत मुश्किल है। अष्टकोणीय मंदिर में शेशनाग मुद्रा के साथ विष्णु की एक प्राचीन मूर्ति है, अर्थात् चार सशस्त्र विष्णु शेशनाग पर सो रहे हैं।
