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सौरभ तिवारी की स्वरचित कविता ‘मुझे दिव्यांग कहने वाले’……

मुझे दिव्यांग कहने वाले
मुझे दिव्यांग कहने वाले
तू भी दिव्यता का अनुभव कर,
सिर्फ एक साल के लिए अपनी
बांध ले पट्टी आखों पर। धृ।
आलिशान मकान से निकल
आजा खुली सडक पर,
सफेद छड़ी लेकर चल
पहुंच कर दिखा मंज़िल पर.
काफी आसान होता है
किसी को कोई विशेषण देना,
पर जिस पर बिती वही बताए
कितनी मुश्किलो भरा है जीना.
बड़े भारी विशेषणों से
क्या कभी किसी का पेट भरा है?
विशेषणों के बोज तले
आज हर विकलांग अर्ध मरा है.
अब तुही बजाले जोरदार तालिया
लंबे चौड़े भाषणों पर,
मुझे दिव्यांग कहने वाले
तू भी दिव्यता का अनुभव कर। 1।
मुझमे दिव्यता है ना फिर क्यौं
मै भुका कंगाल घुमता हूं?
रोटी के लिए क्यौं हर चौकट पर
मै कदम लोगों के चुमता हूं?
क्यौं होता अपमान हरघडी?
क्यौं मिलती उपेक्षा हैं?
रोजगार मुज से रुठा क्यौं हैं?
क्यौं आधी अधुरी शिक्षा हैं?
आ तू भी लग जा कतार में
प्रमाणपत्र के लिए अर्ज़ी कर,
मुझे दिव्यांग कहने वाले
तू भी दिव्यता का अनुभव कर। 2।
वह गुजराथी फकीर था
जिसने हरिजन कह कक बुलाया था,
वर्णद्वेश का कडवा जहर
अमृत बोल कर पिलाया था;
तू भी खुद को फकिर है कहता
विकलांगों से दिव्यांग बनाया,
अपमान उपेक्षा से मरने वालों को
मखमल का तुने कफन पहनाया .
अब तू ही बता हरिजन और दिव्यांग में
क्या गुणात्मक है अंतर?
मुझे दिव्यांग कहने वाले
तू भी दिव्यता का अनुभव कर।।

सौरभ तिवारी मेडिकल कॉलेज अल्मोड़ा, 9456183501

By swati tewari

working in digital media since 5 year

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